साहित्य

श्री प्राणनाथ ज्ञानपीठ द्वारा प्रकाशित

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हमारी रहनी

हमारी रहनी

लेखक- श्री राजन स्वामी

प्रत्येक युग में श्रेष्ठ आचरण का महत्व रहा है। नीतिशास्त्र का कथन है कि "आचार हीनं न पुनन्ति वेदाः" अर्थात् आचरण से हीन व्यक्ति को वेद भी पवित्र नहीं कर सकते हैं। किसी भी महापुरुष की महानता उसके आचरण से ही आँकी जाती है। कोई भी समाज या राष्ट्र श्रेष्ठ आचरण से रहित हो जाने पर विनाश को प्राप्त हो जाता है।

धर्मग्रन्थों की दृष्टि में सुन्दरसाथ का समाज परमहंस ब्रह्ममुनियों का समाज कहा जाता है। जो व्यक्ति जितने ही उच्च शोभायुक्त पद पर विराजमान हो, उससे उतने ही श्रेष्ठ आचरण (रहनी) की अपेक्षा की जाती है। इस तथ्य को ध्यान में रखते हुए "हमारी रहनी" नामक इस ग्रन्थ की रचना की गयी है। इस ग्रन्थ में श्रीमुखवाणी, वेद, उपनिषद्, दर्शन, तथा बौद्ध धर्मग्रन्थ "धम्मपद" की सहायता से आचरण के सभी पक्षों पर प्रकाश डाला गया है।

ज्ञान मंजूषा

ज्ञान मंजूषा

लेखक- श्री राजन स्वामी

इस मायावी जगत् में जहाँ "मुण्डे-मुण्डे मतिः भिन्ना" की प्रवृत्ति है, वहाँ एकमत होना काफी कठिन प्रतीत होता है, फिर भी जाग्रत बुद्धि के ज्ञान से समीक्षा करने पर सभी मतों का एकीकरण हो जाता है और सभी धर्मग्रन्थों में छिपे हुए मोतियों को एकत्रित कर सत्य की माला बनायी जाती है।

इस छोटे से ग्रन्थ में श्रीमद्भागवत् के ४०, वेदान्त के १५, एवं वेद के २५ कठिनतम् प्रश्नों का समाधान करने का प्रयास किया गया है।

दोपहर का सूरज

दोपहर का सूरज

लेखक- श्री राजन स्वामी

श्री प्राणनाथ जी का स्वरूप ज्ञान की दोपहरी का वह सूरज है, जिसके उग जाने पर अध्यात्म जगत में किसी भी प्रकार का अन्धकार रूपी संशय नहीं रहता। वेदों की ऋचायें जिस अक्षर-अक्षरातीत को खोजती हैं, दर्शन ग्रन्थ जिस सत्य को पाना चाहते हैं, गीता और भागवत जिस परम लक्ष्य उत्तम पुरुष की ओर संकेत करते हैं, कुरान की आयतें जिस अल्लाह तआला का वर्णन करना चाहती हैं, बाइबल जिस प्रेम के स्वरूप का वर्णन करने का प्रयास करती है, और सन्तों की वाणियाँ जिस सत्य की ओर सन्केत करती हैं, उसकी पूर्ण प्राप्ति श्री प्राणनाथ जी की वाणी में निहित है।

इस ग्रन्थ में अक्षरातीत श्री प्राणनाथ जी की लीलाओं को उपन्यास की शैली में सरल भाषा में प्रस्तुत किया गया है।

विरह के प्रकरण

किरन्तन ग्रन्थ के प्रकरण ३५-४० उस समय उतरे, जब श्री प्राणनाथ जी मन्दसौर में सुन्दरसाथ सहित विरक्त भेष में विराजमान थे और कृपाराम जी उदयपुर का दुःख भरा समाचार लेकर आये। सुन्दरसाथ के कष्टों की निवृत्ति के लिये ये छः प्रकरण श्री महामति जी के धाम हृदय से फूट पड़े। इन प्रकरणों का श्रद्धापूर्वक पाठ सुन्दरसाथ को लौकिक कष्टों से छुटकारा दिलाता है।

मेहेर सागर

सागर ग्रन्थ के अन्तर्गत आठवाँ सागर मेहेर या कृपा का सागर है। अक्षरातीत श्री राज जी की मेहर बनी रहे, इस भावना से सुन्दरसाथ किसी भी अवसर पर प्रायः इस प्रकरण का पाठ करके कार्य प्रारम्भ करते हैं।



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