निजानन्द दर्शन

निजानन्द सम्प्रदाय की पद्धति

तीन पुरुष, तीन ब्रह्माण्ड, और तीन सृष्टियाँ

गीता में कहा गया है कि दो पुरुष हैं- क्षर एवं अक्षर । सभी प्राणी एवं पंचभूत आदि क्षर हैं तथा इनसे परे कूटस्थ अक्षर ब्रह्म कहे जाते हैं । इनसे भी परे जो उत्तम पुरुष अक्षरातीत हैं, एकमात्र वे ही परब्रह्म की शोभा को धारण करते हैं । (गीता १५/१६,१७)

कुछ लोग भ्रमवश प्रकृति को अक्षर कहते हैं । इस सम्पूर्ण सृष्टि में व्याप्त कारण प्रकृति तो जड़ तथा नश्वर है, तो उसे अक्षर कैसे कह सकते हैं ? इसके अतिरिक्त, यदि प्रकृति अक्षर है, तो उसे पुरुष के रूप में वर्णित क्यों नहीं किया गया ?

कुछ लोग अज्ञानता के कारण जीव तथा नारायण को ही अक्षर कहते हैं । नारायण और जीव एक ही स्वरूप हैं तथा दोनों महाप्रलय में अपने मूल स्वरूप में लीन हो जाते हैं ।

तारतम ज्ञान की दृष्टि में-

1. यह सम्पूर्ण साकार-निराकार जगत (प्रकृति, नारायण सहित) क्षर है ।

2. इससे परे तेजमयी, अविनाशी ब्रह्म अक्षर हैं ।

3. उनसे भी परे सच्चिदानन्द स्वरूप अक्षरातीत हैं ।

क्षर पुरुष या क्षर ब्रह्माण्ड

क्षर

अक्षर ब्रह्म के मन (अव्याकृत) के स्वप्न में मोह सागर (महत्तत्व) में नारायण (आदि पुरुष, विराट पुरुष) का स्वरूप प्रकट होता है, जिन्हें क्षर पुरुष या प्रणव (ॐ) कहते हैं । उन्हें ही आदिनारायण, हिरण्यगर्भ, महाविष्णु, प्रथम पुरुष, शब्द ब्रह्म आदि नामों से जाना जाता है । इन्हीं से वेद प्रकट होते हैं तथा सभी जीव इन्हीं की चेतना का प्रतिभास स्वरूप हैं। सम्पूर्ण जीव समुदाय , पञ्च भूतात्मक जगत, अष्टधा प्रकृति (पञ्चभूत, मन, बुद्धि, अहंकार), आदि नारायण, तथा महाशून्य (मोह सागर) सभी क्षर पुरुष के अन्तर्गत आते हैं ।

इत अछर को विलस्यो मन, पांच तत्व चौदे भवन । यामें महाविष्णु मन, मन थें त्रैगुन, ताथें थिर चर सब उतपन ।। (प्रकास हि. ३७/२४)

इस मोह सागर के अन्दर अक्षर ब्रह्म के मन के स्वरूप अव्याकृत के मन ने प्रवेश किया, जिसके कारण यह पाँच तत्व तथा चौदह लोक का ब्रह्माण्ड बना । इसमें अव्याकृत का मन के स्वरूप महाविष्णु (क्षर पुरुष) बने और फिर इसके तीन गुणों से सदाशिव, ईश्वर, ब्रह्मा, विष्णु, और शिव उत्पन्न हुए और उनसे ही यह सारा संसार बना है ।

नारायण की नाभि से कमल निकलता है और उससे ब्रह्मा प्रकट होते हैं । वह ब्रह्मा वेदों के सर्वश्रेष्ठ ज्ञाता कहलाते हैं और संसार रूपी वृक्ष के बीज हैं । अहंकार को ही नाभि कहा गया है । कमल की नाल इच्छा शक्ति और कमल का फूल उनके मन का प्रतीक है । आदिनारायण के मन में जब यह इच्छा हुई कि मै अनेक हो जाऊँ, तो उससे अहंकार उत्पन्न हुआ, जिससे सभी देव, जीव, और यह मिटने वाला संसार खड़ा हुआ ।

क्षर की सृष्टि को जीव सृष्टि कहते हैं । कालमाया के ब्रह्माण्ड में द्वैत की लीला है, अर्थात् जीव (नारायण, त्रिदेव, देवी-देवता, मनुष्य, अन्य चराचर प्राणी) तथा प्रकृति (माया) की लीला है । इसमें जन्म-मरण , सुख-दुःख का चक्र चलता रहता है । अहंकार रूपी कड़ी जब तक नहीं छूटती, तब तक संसार झूठा होते हुए भी सच्चा लगता है और उसे कोई छोड़ना नहीं चाहता । जब तक जीव का अहंकार नष्ट नहीं होगा, तब तक आवागमन का चक्र समाप्त नहीं हो सकता । अतः नारायण से लेकर जीवों तक यह सारी सृष्टि मोह (अज्ञान) रूप है । ब्रह्मज्ञान (तारतम) व प्रेम का मार्ग पकड़कर ही इस भवसागर को पार किया जा सकता है ।

जिसका प्रतिदिन क्षरण हो, उसे ही क्षर कहते हैं । इस क्षर ब्रह्माण्ड को ही हद, कालमाया, मोह जल, भवसागर आदि नामों से जाना जाता है । जिस प्रकार नींद टूटने पर सपना टूट जाता है तथा स्वप्न के सभी दृश्य समाप्त हो जाते हैं, उसी प्रकार अक्षर ब्रह्म के मन (अव्याकृत) का स्वप्न टूटते ही सम्पूर्ण जगत महाप्रलय में लीन हो जाता है ।

अक्षर ब्रह्माण्ड (योगमाया या बेहद)

अक्षर

क्षर से परे जो अविनाशी, अखण्ड, नूरमयी तत्व है, उसे अक्षर कहा जाता है ।

अछर सरूप के पल में , ऐसे कई कोट इंड उपजे । पल में पैदा करके , फेर वाही पल में खपे ।। (किरन्तन ७४/२६)

अक्षर ब्रह्म के एक पल में करोड़ों ब्रह्माण्ड बनते और नष्ट हो जाते हैं ।

उस सर्वोत्पादक ब्रह्म (अक्षर ब्रह्म) ने द्यौ और पृथ्वी को दृढ़ता से स्थिर किया । उसने ही आनन्दमय लोक और उसने ही प्रकाशमय मोक्षधाम (योगमाया) धारण कर रखा है । उसने ही अन्तरिक्ष और लोक-लोकान्तरों को बनाया है । उसकी कृपा से विद्वान मोक्ष को प्राप्त करते हैं। (अथर्ववेद १३/१/७)

जो उत्पन्न हुआ, जो उत्पन्न होने वाला है, और जो यह वर्तमान जगत है, इस सबके प्रति पुरुष (अक्षर ब्रह्म) ही अपना विक्रम दर्शा रहा है । सभी चराचर प्राणी तथा प्राकृतिक लोक इस पुरुष के एक पाद (चतुर्थ पाद मनस्वरूप अव्याकृत) के संकल्प से निर्मित हैं और इस पुरुष के तीन पाद (सबलिक, केवल, सत्स्वरूप) उत्पत्ति तथा विनाश से रहित अपने अखण्ड प्रकाशमय स्वरूप में विद्यमान रहते हैं । (ऋग्वेद १०/९०/२, यजुर्वेद ३१/२, सामवेद आरण्यक ६/४/५)

अक्षर ब्रह्म जो इच्छा करते हैं, वही इच्छा सत् स्वरूप में आ जाती है । वही इच्छा केवल, सबलिक होते हुए मन के स्वरूप अव्याकृत में आ जाती है । उसी से सृष्टि की रचना होती है। अक्षर ब्रह्म का चौथा पाद अव्याकृत, इस प्राकृतिक जगत की उत्पत्ति का निमित्त कारण है । उसके संकल्प मात्र से उत्पन्न प्रकृति असंख्यों लोक-लोकान्तरों का निर्माण करती है । निमित्त कारण होने के कारण अव्याकृत ब्रह्म इस जगत से परे है । इस जड़ जगत में केवल उनकी सत्ता है, उनका स्वरूप नहीं । अतः अव्याकृत भी अखण्ड हैं।

अव्याकृत से परे अक्षर ब्रह्म के तीन पाद इस प्रकार हैं - सबलिक ब्रह्म (चित्त स्वरूप), केवल ब्रह्म (बुद्धि स्वरूप), सत्स्वरूप ब्रह्म (वास्तविक स्वरूप) । सबलिक ब्रह्म के सूक्ष्म में चिदानन्द लहरी नामक शक्ति विराजमान है, जो माया और त्रिगुण (आदिनारायण) का मूल स्थान है । शंकराचार्य जी ने सबलिक ब्रह्म को ही पूर्ण ब्रह्म मानते हुए चिदानन्द लहरी को उनकी महारानी माना है (सौन्दर्य लहरी ग्रन्थ- श्लोक ९८) । सबलिक से परे केवल ब्रह्म की नौ रसों वाली आनन्दमयी भूमि है (तैतरीयोपनिषद्) । इससे परे अक्षर ब्रह्म के अहं का स्वरूप सत्स्वरूप ब्रह्म है । यह तीनों पाद अखण्ड, प्रकाशमय, और सुखमय हैं । इन्हें ही वेद में त्रिपाद अमृत कहा गया है ।

अक्षर ब्रह्म की लीला के इस अखण्ड ब्रह्माण्ड को अक्षर ब्रह्माण्ड या बेहद या योगमाया कहते हैं । यह ब्रह्माण्ड चैतन्य, अविनाशी है तथा इसके कण-कण में करोड़ों सूर्यों के समान प्रकाशमय ब्रह्म का स्वरूप विद्यमान है । यहाँ अक्षर ब्रह्म के अन्तःकरण की अद्वैत लीला अखण्ड रूप से होती है । अक्षर ब्रह्म अपनी अभिन्न शक्ति स्वरूपा अखण्ड चैतन्य माया के साथ लीला करते हैं ।

अक्षर ब्रह्म की आत्माओं को ईश्वरी सृष्टि कहते हैं, जिनका निवास सत्स्वरूप ब्रह्म में है । परमधाम की आत्माओं के साथ ये भी इस नश्वर जगत् में आयी हैं ।

अक्षर ब्रह्म का मूल स्वरूप इन चारों अखण्ड पादों से ऊपर है । वह सच्चिदानन्द परब्रह्म के सत् स्वरूप हैं तथा योगमाया से परे अखण्ड परमधाम में रहते हैं । अक्षर ब्रह्म का स्वरूप अखण्ड व एकरस है । वह अनादि काल से जैसा था, वैसा ही अब भी है, और अनन्त काल के पश्चात् भी वैसा ही रहेगा । उसके अनन्त ज्ञान, अनन्त शक्ति में कभी भी कमी नहीं आ सकती । उसकी उपासना करके, साक्षात्कार करने वाले अविनाशी धाम को प्राप्त होते हैं ।

अक्षरातीत परमधाम

अक्षरातीत

पूर्ण ब्रह्म का स्वरूप निराकार (मोहतत्व), बेहद, अक्षर से भी परे है । मुण्कोपनिषद् में कहा गया है कि उस अनादि, अविनाशी, कूटस्थ अक्षर ब्रह्म से परे जो चिदघन स्वरूप है, उन्हें ही अक्षरातीत कहते हैं । परब्रह्म, परमात्मा, पूर्णब्रह्म, सनातन पुरुष, श्री राज, प्राणनाथ आदि उन्हीं के सम्बोधन हैं ।

अतिशय तेज (असंख्यों सूर्य) से प्रकाशमान, अति मनोहारिणी, यशोरूप तेज से चारों ओर से घिरी हुई, अति तेजस्विनी, किसी से भी न जीती गई उस ब्रह्मपुरी में ब्रह्म प्रवेश किए हुए हैं । (अथर्ववेद १०/२/३३)

आठ चक्रों और नवद्वारों से युक्त, अपने आनन्द स्वरूप वालों की, किसी से युद्ध के द्वारा विजय न की जाने वाली (अयोध्या) पुरी है । उसमें तेज स्वरूप कोश सुख स्वरूप है, जो ज्योति से ढका हुआ है (अथर्ववेद १०/२/३१) । यहाँ आठ चक्रों का तात्पर्य शरीर के आठ चक्रों से अथवा प्रकृति के आठ आवरणों से नहीं है क्योंकि यह तो नाशवान हैं, जबकि इस ब्रह्मपुरी को अमृत स्वरूप कहा गया है । श्रीमुखवाणी में वर्णित परमधाम को घेरकर आए आठ सागरों को ही आठ चक्र कहकर सम्बोधित किया गया है । इसी प्रकार नवद्वारों को परमधाम की नव भूमियों के लिए वर्णित किया गया है । अयोध्या कहने का अभिप्राय है कि इस परमधाम में संसार का कोई भी जीव (नारायण सहित) ध्यानावस्था में कदापि प्रवेश नहीं कर सकता । सशरीर तो कोई भी प्राणी निराकार से आगे योगमाया में भी नहीं जा सकता ।

बुध तुरिया दृष्ट श्रवना , जेती गम वचन । उतपन सब होसी फना , जो लो पोहोंचे मन ।। (किरन्तन २७/१६)

बुद्धि, चित्त, मन, दृष्टि, श्रवण, और वाणी की पहुँच से वह परब्रह्म सर्वथा परे हैं । यह उत्पन्न होने वाला सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड ही नश्वर है । इसलिए यहाँ की किसी भी वस्तु से उस परम तत्व को कहा नहीं जा सकता है ।

अक्षरातीत नूरजमाल , ए तरफ जाने अछर नूर । एक या बिना त्रैलोक को , इन तरफ की न काहू सहूर ।। (सिनगार २/५४)

एकमात्र अक्षर ब्रह्म ही पूर्णब्रह्म अक्षरातीत (नूरजमाल) के विषय में जानते हैं । उनके अतिरिक्त सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड को अक्षरातीत की कोई भी जानकारी नहीं है । अतः पूर्ण ब्रह्म का विषय अति गोपनीय है तथा तारतम ज्ञान के बिना उन्हें नहीं जाना जा सकता ।

उस तेजोमय कोश में तीन अरे (अक्षर ब्रह्म, पूर्ण ब्रह्म, तथा आनन्द अंग) तीन (सत् चित् आनन्द) में प्रतिष्ठित हैं । उसमें जो परम पूज्यनीय तत्व, परमात्म स्वरूप हैं, उसका ही ब्रह्मज्ञानी लोग ध्यान किया करते हैं । (अथर्ववेद १०/२/३२)

वह परब्रह्म सत्, चिद्, आनन्द लक्षणों वाला है, इसलिए उसे सच्चिदानन्द कहते हैं । परब्रह्म स्वयं चिदघन स्वरूप हैं, उनकी सत्ता का स्वरूप अक्षर ब्रह्म हैं, तथा आनन्द का स्वरूप श्री श्यामा जी हैं । यह तीनों मिलकर सच्चिदानन्द स्वरूप कहलाते हैं । वैसे तो वह तीनों एक ही स्वरूप माने जायेंगे, परन्तु उनमें लीला रूप में भेद है । अक्षर ब्रह्म सत्ता के स्वरूप हैं, जबकि अक्षरातीत अपनी आनन्द अंग श्यामा जी व आत्माओं के साथ पवित्र प्रेम व आनन्द की लीला करते हैं ।

अक्षरातीत पूर्ण ब्रह्म श्री राज जी का स्वरूप अक्षर ब्रह्म की भांति सर्वदा एकरस रहता है । उनके स्वरूप में न तो ह्रास होता है, न ही विकास । उनका स्वरूप नूरमयी (शुक्रमयी), अनन्य प्रेममयी, और आनन्दमयी है ।

सरूप सुन्दर सनकूल सकोमल , रूह देख नैना खोल नूरजमाल । (किरन्तन ११२/१)

श्री महामति जी कहते हैं कि हे मेरी आत्मा ! तू अपने नेत्रों को खोलकर अपने आधार (अक्षरातीत) का दर्शन कर, जिनका स्वरूप अति सुन्दर, प्रफुल्लित, और कोमल है ।

इन सिंघासन ऊपर , बैठे जुगल किसोर । वस्तर भूखन सिनगार , सुन्दर जोत अति जोर ।। (सागर १/११८)

परमधाम में सिंहासन पर अपने अनुपम किशोर स्वरूप में श्री राज श्यामा जी (पूर्णब्रह्म अक्षरातीत व उसकी आनन्द स्वरूपा) विराजमान हैं । उनके वस्त्र, आभूषण, तथा श्रृंगार ज्योति से परिपूर्ण अत्यधिक सुन्दर हैं ।

परमधाम में स्वलीला अद्वैत है । वहाँ का कण-कण सच्चिदानन्दमयी है । जिस प्रकार चन्द्रमा से चांदनी, सागर से लहरें, सूर्य से किरणें अलग नहीं होते, उसी प्रकार सच्चिदानन्द परब्रह्म की आत्मायें जिन्हें ब्रह्मसृष्टि कहते हैं उनसे कभी अलग नहीं होतीं, बल्कि उन्हीं का स्वरूप हैं । यही "स्वलीला अद्वैत" का रहस्य है ।

अछरातीत के मोहोल में , प्रेम इस्क बरतत । सो सुध अक्षर को नहीं , जो किन विध केलि करत ।। (किरन्तन ७४/२९)

अक्षरातीत परब्रह्म के रंगमहल में अनन्य प्रेम (इश्क) की सर्वदा ही लीला होती रहती है । अक्षरातीत अपनी प्रियाओं (आत्माओं) से किस प्रकार प्रेम की लीला करते हैं, इसकी जानकारी अक्षर ब्रह्म को भी नहीं थी ।

परमधाम भी अक्षरातीत के समान नूरमयी, मनोहारिणी, व अत्यधिक प्रकाशमान है । वहाँ प्रत्येक वस्तु में चार गुण हैं- चेतनता, नूर (तेज), कोमलता, और सुगन्धि । वहाँ की हर वस्तु अक्षरातीत का ही स्वरूप है, उन्हीं के समान चेतन, और उनकी प्रेम की लीला में भली प्रकार सम्मिलित होती है । प्रत्येक वस्तु प्रेम और आनन्द के रस से ओत-प्रोत है ।

अक्षरातीत परब्रह्म का इस नश्वर संसार में दो बार प्रकटन हुआ । दूसरी बार, कलियुग में श्री प्राणनाथ जी के स्वरूप में आकर उन्होंने सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड को अखण्ड मुक्ति दी है ।



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जीव और आत्मा में अन्तर

सृष्टि के प्रारम्भ से आज तक कोई भी जीव और आत्मा का भेद स्पष्ट नहीं कर पाया था । वैदिक साहित्य में भी दोनों को पुल्लिंग तथा समानार्थक ही माना गया है । श्री प्राणनाथ जी की वाणी (तारतम) के द्वारा इस भेद का निरूपण हुआ ।

भी वासना जीव का बेवरा एता, ज्यों सूरज दृष्टें रात । जीव का अंग सुपन का, वासना अंग साख्यात ।। (कलस हि. २३/६१)

जीव और आत्मा में इतना अन्तर है जितना रात और सूर्य में है । जीव की उत्पत्ति स्वप्न के स्वरूप (आदिनारायण) से है, जबकि आत्मा साक्षात् परब्रह्म का अखण्ड और अनादि अंग है ।

भी बेवरा वासना जीव का , याके जुदे जुदे हैं ठाम । जीव का घर है नींद में , वासना घर श्री धाम ।। (कलस हि. २३/६२)

आत्मा और जीव में यह भी अन्तर है कि इनके मूल घर अलग-अलग हैं । जीव का मूल घर नींद (निराकार) में है तथा आत्मा का मूल घर परब्रह्म का अनादि एवं अखण्ड परमधाम है ।

ए सबे तुम समझियो , वासना जीव विगत । झूठा जीव नींद न उलंघे , नींद उलंघे वासना सत ।। (कलस हि. २४/२२)

आत्मा और जीव में यह भी अन्तर है कि झूठा जीव स्वप्न से उत्पन्न होने के कारण नींद (निराकार) को पार नहीं कर पाता । जबकि आत्मायें निराकार एवं अक्षरधाम को भी पार करके अपने मूल घर अखण्ड परमधाम में पहुँच जाती हैं ।

श्रुति के कथनानुसार नारायण ही जीवों के साक्षात् परब्रह्म हैं और जीव उनका प्रतिभास रूप हैं। जीव स्वतन्त्र नही हैं, अपितु पराधीन हैं । वे मोह, अविद्या, और अहंकार से ही बने हैं और जन्म-मरण एवं सुख-दुःख (कर्मफल भोग) के चक्र में ही फँसे रहते हैं । जीव माता के गर्भ में प्रवेश करता है । मनुष्य शरीर के अतिरिक्त जीव अनेक योनियों में भी शरीर (जीवन) धारण करता है । नारायण का स्वप्न टूटते ही, अर्थात् महाप्रलय होते ही, जीव उनमें समा जाते हैं ।

आत्मा अनादि और अखण्ड है । वह कभी गर्भ में नहीं आती, अपितु जन्म के पश्चात् ही शरीर में प्रवेश करती है । आत्मा कभी भी मनुष्य तन के अतिरिक्त किसी अन्य योनि में शरीर धारण नहीं करती । परब्रह्म का स्वरूप होने से वह प्रेम व आनन्द में मग्न रहती हैं । वे एक क्षण के लिए भी उनसे अलग नहीं हो सकती ।

जीव उस अविनाशी ब्रह्म को माता, पिता, स्वामी, सखा आदि अनेक भावों का रूप मानकर स्तुति करता है । जबकि आत्मा उस परब्रह्म की अभिन्न अंग होने के कारण अनन्य प्रेम भाव के मार्ग पर चलती है । आत्मा के इस अलौकिक प्रेम को प्रदर्शित करने के लिए वेदों में कहीं-कहीं आत्मा का परब्रह्म के लिए पत्नी (स्त्री) भाव वर्णित किया गया है-

मैं इस पाप-दहन करने के सामर्थ्य वाली, अज्ञान की विरोधिनी, अत्यधिक बलवती ब्रह्मविद्या को खोदती हूँ या प्राप्त करती हूँ, जिससे सौत- अविद्या या माया- का विनाश किया जाता है और जिससे आत्मा अपने एकमात्र पति परब्रह्म को प्राप्त कर लेती है । (ऋग्वेद १०/१४५/२ ।। अथर्ववेद ३/१८/१)

अन्ततः निष्कर्ष यह है कि जीव व आत्मा में वही अन्तर है, जो झूठ (स्वप्न) और सत्य में है ।

निजानन्द सम्प्रदाय के सिद्धान्त

  • परब्रह्म अक्षरातीत को ही अपना इष्ट मानते हैं ।
  • वह अक्षरातीत युगल स्वरूप, परम किशोर, अनादि, अविनाशी, व स्वलीला अद्वैत है ।
  • दिव्य ब्रह्मपुर ही हमारा धाम है ।
  • धाम धनी अक्षरातीत की उपासना पतिव्रत साधन से करते हैं ।
  • हकी स्वरूप श्री प्राणनाथ जी की शोभा सुन्दरसाथ (परमहंसों) व हद-बेहद ब्रह्माण्डों में सर्वोपरि है ।
  • अपने पूजा स्थल में श्री प्राणनाथ जी (परब्रह्म अक्षरातीत) द्वारा अवतरित वाणी "श्री कुलजम स्वरूप" को उन्हीं का वाङमय स्वरूप मानकर पूजा करते हैं । सभी पूजा स्थल वास्तव में ज्ञान मन्दिर हैं, जिनका मूल प्रयोजन श्री मुख वाणी के पठन-पाठन व चिन्तन-मनन को प्रोत्साहित करना है।
  • श्री प्राणनाथ जी के वाङमय स्वरूप के अतिरिक्त किसी अन्य स्वरूप, व्यक्ति, मूर्ति, चित्र, समाधि, या जड़ वस्तु की पूजा निषेध है ।
  • निजानन्द सम्प्रदाय के सभी अनुयायियों (सुन्दरसाथ) को परमधाम की आत्मा (ब्रह्मसृष्टि) मानकर उनकी सेवा करना।
  • सभी सुन्दरसाथ समान हैं । उनमें आध्यात्मिक पद, आयु, जाति, क्षेत्र, लिंग, या आर्थिक स्थिति का भेद मान्य नहीं है । आत्मिक दृष्टिकोण व आध्यात्मिक योग्यता को ही प्राथमिकता देना ।
  • परमधाम की आत्माएँ जो अभी संसार में ही मग्न हैं, उन तक ब्रह्मवाणी को पहुँचाना ही जागनी है । जागनी सभी सुन्दरसाथ का नैतिक धर्म व वास्तविक सेवा है ।
  • जिस प्रकार दीपक से दीपक जलाया जाता है, उसी प्रकार कोई भी सुन्दरसाथ किसी भी जिज्ञासु व्यक्ति को प्रबोधित करके (तारतम देकर) सुन्दरसाथ के समूह में सम्मिलित कर सकता है ।
  • किसी भी शारीरिक कर्मकाण्ड (जप, परिक्रमा, उपवास, भजन, नृत्य आदि) पर विश्वास न करके आत्मिक भाव से ज्ञानार्जन, प्रेम, व चितवनि के मार्ग पर चलना ।
  • सबसे पूजनीय स्थान श्री ५ पद्मावती पुरी (पन्ना, मध्य प्रदेश) को माना जाता है ।
  • धूम्रपान, माँस, मदिरादि नशीले पदार्थ व तामसी भोजन का सेवन वर्जित है । विषय-वासना, झूठ, व चोरी से संयम करना आवश्यक है ।
  • श्री प्राणनाथ जी के आवेश से अवतरित श्री कुलजम स्वरूप वाणी और श्री लालदास जी कृत श्री बीतक साहेब पूज्य ग्रन्थ हैं ।
  • सभी आयु वर्ग के सुन्दरसाथ एक-दूसरे को समान मानते हुए परस्पर अभिवादन में प्रणाम का प्रयोग करते हैं।
  • शारीरिक संस्कारों (जन्म, विवाह, मृत्यु आदि) को भी सादी रीति से निभाना । कोई विशेष कर्मकाण्ड वर्जित है।
  • जो हमारे साथ बुराई करे, उसके साथ भी भलाई करना ।
  • धर्म के अन्य सामान्य सिद्धान्तों का पालन ।

भक्ति का मार्ग कैसा हो?

पिपीलिका का अर्थ होता चींटी । चींटी के समान धीरे-धीरे चलकर किसी मार्ग को पार करना ही पिपीलिका मार्ग का अनुसरण करना है ।

श्रवण कीर्तनं विष्णोः स्मरणं पादसेवनं । अर्चनं वन्दन दास्यं सख्यं आत्म निवेदन ।।

अर्थात् नवधा भक्ति के सभी साधन यथा श्रवण, कीर्तन, स्मरण, अर्चन, पाद सेवन, वन्दन, दास्य, सख्य, और आत्म-निवेदन इस मार्ग के अन्तर्गत आते हैं ।

उपनिषदों का कथन है कि ब्रह्म मन तथा वाणी से परे है, अतः उसे इन्द्रियों, मन, वाणी, तथा बुद्धि के साधनों से प्राप्त नहीं किया जा सकता । कठोपनिषद् ने तो स्पष्ट रूप से कहा है कि जब पाँचों इन्द्रियाँ मन सहित अपने कारण में लय हो जाते हैं तथा बुद्धि भी किसी प्रकार की क्रिया से रहित हो जाती है, तो उसे ही परमगति कहते हैं । (कठोपनिषद २/६/१०)

इस कथन से तो यह निर्णय हो जाता है कि नवधा भक्ति के सभी साधन ब्रह्म का साक्षात्कार कराने में सक्षम नही हैं, क्योंकि ये शरीर, इन्द्रियों, तथा मन-बुद्धि के धरातल पर किये जाते हैं । इस प्रकार की भक्ति केवल साकार रूप वाले देवी-देवताओं तक सीमित रहती है ।

आरती, पूजा, अर्चना, भोग, प्रार्थना, परिक्रमा, नाम-जप आदि कर्मकाण्ड इस मार्ग का प्रमुख अंश हैं । दुर्भाग्यवश बहुत से सुन्दरसाथ भी इसी मार्ग को अपने जीवन की इति समझ कर संतुष्ट हो गए हैं, जबकि अक्षरातीत के साक्षात्कार का लक्ष्य इससे बहुत दूर है ।

इस विषय पर श्री प्राणनाथ जी कहते हैं-

रे हूं नाहीं व्रत दया संझा अगिन कुंड , ना हूं जीव जगन । तंत्र न मंत्र भेख न पंथ , ना हूं तीरथ तरपन ।। (किरन्तन ११/२)

भिन्न-भिन्न प्रकार के व्रतों के पालन, प्राणियों पर दया, संध्या-हवन, जीव के द्वारा आत्मबोध होने से जो लोग ब्रह्म-प्राप्ति मानते हैं, मैं उनमें नहीं हूँ । विभिन्न प्रकार के तन्त्रों तथा मन्त्रों की साधना करने, अनेक प्रकार की वेशभूषा तथा सम्प्रदाय धारण करने, तीर्थों में वास करने, एवं तर्पण आदि क्रियाओं से परब्रह्म प्राप्ति की आशा रखने वालों में मै नहीं हूँ ।

रे हूं नाहीं नवधा में मुक्त में भी नाहीं , न हूं आवा गवन । वेद कतेब हिसाब में नाहीं , न माहें बाहेर न सुनं ।। (किरन्तन ११/६)

जो लोग नवधा भक्ति में पारंगत हो जाने , चारों प्रकार की मुक्तियों को पाने, तथा सृष्टि कल्याणार्थ मोक्ष से पुनः तन धारण करने को सर्वोपरि पद मानते हैं , मै उनमें नहीं हूँ । मेरा प्राणवल्लभ अक्षरातीत तो चारों वेदों तथा कतेब ग्रन्थों (तौरेत, इंजील, जंबूर और कुरआन) में वर्णित तथ्यों की सीमा , पिण्ड , ब्रह्माण्ड , और शून्य-निराकार से भी परे है ।

सौ माला वाओ गले में , द्वादस करो दस बेर । जोलों प्रेम न उपजे पिउ सों , तोलों मन न छोड़े फेर ।। (किरन्तन १४/५)

अपने गले में एक दो नहीं , बल्कि सौ मालायें डाल लो , केवल एक जगह ही नहीं , बल्कि १२ अंगों में १० बार तिलक लगा लो , लेकिन जब तक प्रियतम से प्रेम नहीं होता , तब तक यह मन माया में फँसना नहीं छोड़ेगा ।

अन्ततः हम इस निष्कर्ष पर पहुँचे हैं कि पिपीलिका मार्ग अध्यात्म की अति प्रारम्भिक अवस्था है । केवल इसी मार्ग पर चलकर भवसागर की लम्बी दूरी पार नहीं की जा सकती । आगे बढ़ने के लिए कोई अन्य मार्ग चाहिए ।

कपि का अर्थ होता है बन्दर । जिस प्रकार एक बन्दर कूदते-फाँदते हुए तेजी से किसी मार्ग को पार करता है, उसी प्रकार इस मार्ग पर समय कम लगता है । यह पिपीलिका मार्ग से श्रेष्ठ परन्तु कठिन है । इसे ही योग कहते हैं । योग की पाँच भूमिकाएँ होती हैं ।

हठयोग के अन्तर्गत आने वाली बन्ध, मुद्रा, प्राणायाम आदि साधनाओं से तथा नादयोग, लययोग, कुण्डली आदि के जागरण से निराकार प्रकृति से परे नहीं हुआ जा सकता क्योंकि जड़ समाधि की पहुँच महाशून्य (निराकार प्रकृति) से आगे नहीं है ।

ऋषि पतंजलि (योग दर्शन के रचयिता) के राजयोग (अष्टांग योग) द्वारा आत्म-साक्षात्कार की स्थिति प्राप्त की जाती है । सम्प्रज्ञात समाधि द्वारा प्रकृति की अन्तिम सीमा (महत्तत्व) तक का साक्षात्कार हो जाता है । सम्प्रज्ञात समाधि के पश्चात् असम्प्रज्ञात समाधि की स्थिति मानी जाती है, जिसे निर्बीज समाधि भी कहते हैं । असम्प्रज्ञात समाधि में महत्तत्व भी प्रकृति में लीन हो जाता है और चेतन जीव की चित्ति शक्ति केवल अपने स्वरूप मात्र में स्थित रह जाती है (योग दर्शन ४/३४) । इसी कारण इस अवस्था को कैवल्य कहते हैं । यह योग की चौथी भूमिका तथा योग दर्शन की सर्वोत्तम उपलब्धि है । इससे भी ब्रह्म का साक्षात्कार नहीं होता ।

योग की पाँचवी तथा अंतिम भूमि में जीव कैवल्य का भी अतिक्रमण करके अपनी शुद्ध हंस अवस्था में स्थित होता है । जीव का यह शुद्ध स्वरूप (हंस) परमगुहा में पहुँचकर ब्रह्म का साक्षात्कार करता है (अथर्ववेद २/१/१) । उपनिषद् , वेद , वेदान्त आदि में केवल परम गुहा (एकादश द्वार) में ही ब्रह्म के साक्षात्कार का वर्णन है, अन्य नहीं । यह वेद का सबसे गुह्य योग मार्ग है । कबीर जी द्वारा प्रवर्तित सूरति-शब्द योग भी यही मार्ग है । परन्तु परम गुहा में भी ब्रह्म (अक्षर ब्रह्म) के मूल स्वरूप का साक्षात्कार नहीं होता अपितु उनकी त्रिपाद विभूति ( सबलिक, केवल तथा सत्स्वरूप ) का ही साक्षात्कार होता है (अथर्ववेद २/१/२) ।

वेद का कथन है कि अक्षर ब्रह्म का मूल स्वरूप त्रिपाद अमृत अर्थात् योगमाया के ब्रह्माण्ड से भी परे है (यजुर्वेद ३१/४) । अक्षरातीत परब्रह्म उस अविनाशी अक्षर से भी परे हैं (मुण्डकोपनिषद् २/१/२/४) । अतः वैदिक योग पद्धति की पराकाष्ठा (अंतिम उपलब्धि ) अक्षर ब्रह्म के चारों पादों से ही सम्बन्धित है । इससे अक्षरातीत पूर्ण ब्रह्म के स्वरूप का साक्षात्कार नहीं हो सकता ।

इस विषय पर श्री प्राणनाथ जी कहते हैं-

रे हूं नाहीं करामात मत अगम निगम, धरम न करम उनमान । सुपन सुषुप्त जाग्रत न तुरिया, तप न जप न ध्यान ।। (किरन्तन ११/३)

योग साधना से प्राप्त होने वाले चमत्कारों के प्रदर्शन, वेद-शास्त्रों के सिद्धान्तों के ग्रहण, अनुमानपूर्वक धर्म एवं कर्मयोग को ही ब्रह्म साक्षात्कार मानने वालों से मै अलग हूँ । जीव के जाग्रत, स्वप्न, सुषुप्ति, तथा समाधि की तुरीय अवस्था में होने वाली अनुभूतियों, जप, तप, तथा साकार एवं निराकार के ध्यान को भी मैं परब्रह्म प्राप्ति नहीं मानता ।

आगम भाखो मन की परखो, सूझे चौदे भवन । मृतक को जीवत करो, पर घर की न होवे गम ।। (किरन्तन १४/१०)

तुम इतने सिद्ध बन जाओ कि योग द्वारा भविष्य की सारी बातें जानने लगो, दूसरों के मन की बात भी जान जाओ, चौदह लोकों का सारा दृश्य भी देखने लगो, तथा मरे व्यक्तियों को जीवित करने लगो, फिर भी तुम्हें अखण्ड घर की पहचान नहीं हो सकती ।

अन्ततः हम इस निष्कर्ष पर पहुँचे हैं कि योग मार्ग कठिन तथा ब्रह्म साक्षात्कार कराने में अक्षम है । आगे बढ़ने के लिए कोई अन्य मार्ग चाहिए ।

विहंग का अर्थ होता है पक्षी । जिस प्रकार पक्षी उड़कर द्रुत गति से कोई भी दूरी पार कर लेता है, उसी प्रकार इस मार्ग पर चलकर अति शीघ्र परब्रह्म का साक्षात्कार किया जा सकता है। यह अत्यन्त सरल व सीधा मार्ग है । इसे विहंगम योग, परम योग, या प्रेम लक्षणा भक्ति भी कहते हैं ।

श्री प्राणनाथ जी का कथन है-

कई दरवाजे खोजे कबीरें , बैकुण्ठ सुन्य सब देख्या । आखिर जाए के प्रेम पुकारया , तब जाए पाया अलेखा ।। (किरन्तन ३२/१०)

कबीर जी ने ब्रह्म प्राप्ति के लिए अनेक मार्गों को अपनाया । उन्होंने वैकुण्ठ-शून्य सबकी अनुभूति की । अन्त में जब प्रेम की सच्ची राह पकड़ी , तब उन्हें उस अलख अगोचर ब्रह्म की प्राप्ति हुई ।

अक्षरातीत पूर्ण ब्रह्म का साक्षात्कार करने के लिए हमें शरीर, मन, बुद्धि आदि के धरातल पर होने वाली उपासना पद्धतियों को छोड़कर श्री प्राणनाथ जी की तारतम वाणी के आधार पर उस मार्ग का अवलम्बन करना पड़ेगा, जिसके विषय में गीता में स्पष्ट रूप से कहा गया है कि पुरुषः स परः पार्थ भक्त्या लभ्यस्तु अनन्यया अर्थात् वह परब्रह्म अनन्य प्रेम लक्षणा भक्ति द्वारा प्राप्त होता है, जो नवधा आदि सभी प्रकार की उपासना पद्धतियों से भिन्न है। अखण्ड मुक्ति की प्राप्ति भी इसी अनन्य प्रेम द्वारा होती है ।

श्री मुख वाणी का कथन है-

यामें प्रेम लछन एक पारब्रह्म सों , एक गोपियों ए रस पाया । तब भवसागर भया गौपद बछ , विहंगम पैंडा बताया ।। (किरन्तन ३२/९)

प्राणवल्लभ अक्षरातीत की अनन्य प्रेम लक्षणा भक्ति का रसमयी मार्ग केवल गोपियों ने ही पाया , जिससे उनके लिए यह अथाह भवसागर गाय के बछड़े के खुर से बने हुए गड्ढे की तरह छोटा हो गया । तब उन्होंने बड़ी सरलता से इसे वैसे ही पार कर लिया जैसे कोई पक्षी एक ही उड़ान में अपनी मंजिल तक पहुँच जाता है ।

श्री प्राणनाथ जी द्वारा दिये गये ब्रह्मज्ञान तारतम से ही इस मार्ग का पता चल सका है । इस मार्ग पर चलने के लिए तीन बातों की आवश्यकता है- तारतम ज्ञान , परब्रह्म के प्रति अटूट निष्ठा (ईमान), व प्रेम । तारतम ज्ञान (श्रीमुख वाणी) का बोध हुए बिना न तो क्षर, अक्षर, व अक्षरातीत के सभी रहस्यों का पता चल सकता है , न ही दृढ़ निष्ठा जाग्रत हो सकती है ।

परब्रह्म के प्रति पूर्ण समर्पण व विरह आने से ही प्रेम की उत्पत्ति सम्भव है । श्री मुख वाणी में चार तरह के प्रेम का वर्णन है, जिसमें तृतीय अवस्था में ही अक्षरातीत परब्रह्म का साक्षात्कार हो जाता है तथा चौथी में उनसे एकस्वरूपता हो जाती है । चितवनि के मार्ग का अनुसरण किए बिना प्रेम की यह उच्च अवस्था नहीं प्राप्त की जा सकती।

श्री प्राणनाथ जी ने कहा है-

आतम सों न्यारे न कीजे , आतम बिन काहू न कहीजे । फेर फेर कीजे दरसन , आतम से न्यारे न कीजे अधखिन ।। (परिकरमा ३/१७६)

अर्थात् अक्षरातीत की जिस शोभा का दर्शन हो रहा है, उसे आधे क्षण के लिए भी अपनी आत्मा के चक्षुओं से अलग नही करें । अक्षरातीत के सुन्दर स्वरूप को दिल में बसाना एवं आत्म-चक्षुओं से देखना ही चितवनि है । इसी से आत्मा के हृदय में प्रेम का रस फूटता है तथा अखण्ड आनन्द की प्राप्ति होती है ।

श्री कृष्ण

श्री कृष्ण की त्रिधा लीला

श्री कृष्ण जी के वास्तविक स्वरूप का बोध विरले लोगों को ही है । बहुत कम लोग जानते हैं कि श्री कृष्ण नाम तो एक ही रहा है, किन्तु उसमें लीला करने वाली तीन शक्तियां अलग-अलग समय पर कार्य करती रही हैं ।

1. अक्षरातीत की लीला-

तारतम ज्ञान की दृष्टि तथा धर्मग्रन्थों के कथनों से यह स्पष्ट होता है कि इस नश्वर ब्रह्माण्ड में मात्र ११ वर्ष ५२ दिन तक श्री कृष्ण के तन में अक्षरातीत परब्रह्म के आवेश ने व्रज में लीला की थी ।

व्रज लीला करने के पश्चात् जब अक्षरातीत का आवेश योगमाया के ब्रह्माण्ड में गया, तो इस ब्रह्माण्ड का महाप्रलय कर दिया गया था । उस समय मोहतत्व के भी नष्ट हो जाने पर कुछ भी नहीं बचा था (पुराण संहिता २९/४५) । यदि महाप्रलय की स्थिति न मानें, तो यह प्रश्न होता है कि बांसुरी की आवाज सुनते ही सभी गोपियों की आत्मा तो अपना तन छोड़कर योगमाया के ब्रह्माण्ड में महारास खेलने जा चुकी थीं, तो उनके तनों के दाह संस्कार का कहीं भी वर्णन क्यों नहीं आया ? अपितु श्रीमद्भागवत् में तो यह लिखा है कि गोपों ने प्रातःकाल अपनी पत्नियों (गोपियों) को अपने पास सोते हुए पाया । यह तथ्य स्पष्ट करता है कि ये गोपियाँ नयी थीं, जिन्हें पूर्व ब्रह्माण्ड के महाप्रलय हो जाने का कुछ भी अहसास नहीं था ।

2. गोलोकी लीला-

अचानक ही योगमाया की शक्ति के द्वारा उत्पन्न किए हुए उस महामोहसागर के अन्दर पुनः प्रपञ्चमयी ब्रह्माण्ड बनकर प्रकट हो गया (पुराण संहिता २९/४६) । यह नया ब्रह्माण्ड जैसा का तैसा बना दिया गया, जिसमें प्रतिबिम्ब की लीला हुई । प्रतिबिम्ब लीला में गोलोक (योगमाया) के श्री कृष्ण की शक्ति श्री कृष्ण के तन में तथा वेद ऋचा कुमारिकाओं के जीव गोपियों (सखियों) के तन में विराजमान हुए । गोलोकी श्री कृष्ण ने कुमारिका सखियों के साथ गोकुल में सात दिन तक रास लीला की तथा चार दिन मथुरा में कंस वध आदि लीला की ।

कंस का वध करने के पश्चात् ही गोलोकी शक्ति व्रज में राधा जी के हृदय में विराजमान हो गयी । यही कारण है कि वर्षों तक विरह में तड़पने के बाद भी राधा सहित गोपियाँ मथुरा जाकर विष्णु स्वरूप श्री कृष्ण से भेंट नहीं कर सकी थीं, जबकि गोकुल और मथुरा के बीच केवल सात कि.मी. की दूरी है ।

3. विष्णु लीला-

गोलोकी लीला के पश्चात् वैकुण्ठ नाथ विष्णु भगवान ने ११२ वर्ष तक श्री कृष्ण के तन में लीला की । इस लौकिक लीला में गुरुकुल शिक्षा, रुक्मणि (लक्ष्मी) हरण, योग साधना, असुरों का संहार, द्वारिका स्थापन, महाभारत युद्ध, गीता उपदेश आदि सम्मिलित हैं ।

बृहद्सदाशिव संहिता ग्रन्थ में त्रिधा लीला का बहुत ही सुन्दर वर्णन है, जो इस प्रकार है-

सच्चिदानन्द लक्षणों वाले अक्षरातीत ने ही श्री कृष्ण के रूप में, प्रियाओं द्वारा प्रार्थना किये जाने पर, नित्य वृन्दावन में प्रेमपूर्वक लीला की ।।७।। खेल देखने की इच्छा के कारण होने वाली वियोगमयी लीला के विहार में अपनी प्रियाओं का अनुसरण करने वाले परब्रह्म ने अपने अंशरूप आवेश के साथ अक्षर ब्रह्म की सुरता (चित्तवृत्ति) सहित व्रजमण्डल में आकर वास किया ।।८।। नित्य वृन्दावन के अन्दर जो गुह्य लीला हुई, वह अक्षर ब्रह्म से भी परे स्थित अक्षरातीत की लीला थी । वह गुह्य से भी गुह्य एवं मन-वाणी से अगम है । वह लीला अब अक्षर ब्रह्म के हृदय में अखण्ड रूप से स्थित है ।।९।। नित्य वृन्दावन में परब्रह्म की लीला रूप जो परम ऐश्वर्य स्थित है, वही गोकुल में बाल्यावस्था तथा किशोर लीला के भेद से कहा गया है ।।१०।।

वैकुण्ठ का जो वैभव है, वह मथुरा एवं द्वारिका में स्थित कहा गया है । वृन्दावन और मधुवन में जो लीला रूप ऐश्वर्य स्थित है, वह गोलोक के आश्रय से हुआ है ।।११।।

रास लीला के समय श्रुतियों द्वारा स्तुति किए जाने पर श्री कृष्ण जी ने प्रसन्न होकर उन्हें इच्छानुकूल वरदान दिया । अतः वृन्दावन एवं मधुवन के अन्दर गोलोकी श्री कृष्ण जी ने उन सखियों के साथ सात दिन तक लीला की । पुनः ब्रज मण्डल को छोड़कर मथुरा चले गए । चार दिनों के अन्दर कंस आदि को मारकर धाम पहुँचा दिया ।।१२,१३।। इसके बाद वे अपने तेज सहित गोपियों के हृदय रूपी धाम में गुप्त रूप से स्थित हो गए । तब उनके विरह से व्याकुल चित्त वाली श्रुति रूपा सखियाँ उस गोलोक धाम में चली गईं ।।१४।।

इसके बाद पृथ्वी का भार हरण करने की इच्छा से मथुरा में चक्रधारी विष्णु रूप श्री कृष्ण कुछ वर्षों तक रहे ।।१५।। इसके बाद वे द्वारिका गये और तत्पश्चात् वैकुण्ठ में विराजमान हो गए । इस प्रकार श्री कृष्ण जी की त्रिधा लीला का यह रहस्य बहुत ही गोपनीय तरीके से कहा गया है ।।१६।।

बुद्ध गीता ग्रन्थ के श्रुतिः अध्याय श्लोक १० में ब्रह्मा जी ने नारद जी से त्रिधा लीला का निम्न वर्णन किया है-

"विष्णु एवं आदि विष्णु का स्वरूप एक ही है । इनसे भिन्न जो अक्षर ब्रह्म हैं, उनकी ये स्वप्न में कला रूप हैं । जन्म के समय जो वसुदेव को पुत्र के रूप में प्राप्त हुआ था, वह विष्णु भगवान का परम तेजोमय स्वरूप था । जो जेल से गोकुल में ले जाया गया था, वह उनसे भी भिन्न गोलोकी शक्ति का स्वरूप था । व्रज में जिसने सखियों के साथ लीला की, वह परम ज्योतिमय अलौकिक अक्षर ब्रह्म का स्वरूप था । जिसने योगमाया के अन्दर रास की लीला की, वह अक्षर ब्रह्म की आत्मा से युक्त अक्षरातीत की शक्ति के द्वारा किया हुआ कहा गया । इस प्रकार विष्णु, अक्षर ब्रह्म, एवं अक्षरातीत की प्रतिभासिक लीला के ये तीन स्थान हैं, किन्तु परब्रह्म अक्षरातीत की वास्तविक लीला का तेजोमय स्थान इनसे भिन्न ही है, जो उनके ही समान चेतन रूप वाला तथा अखण्ड है ।"



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