अध्यात्म

सत्यं ज्ञानं अनन्तं ब्रह्म

परब्रह्म कौन व कहाँ है?
प्रेम, शान्ति, और आनन्द का मूल कहाँ है?
मैं कौन हूँ, कहाँ से आया हूँ, तथा मृत्योपरांत मुझे कहाँ जाना है?

ब्रह्मज्ञान की क्या आवश्यकता है ?

शाश्वत सुख एवं शान्ति की चाहना मानव के लिए स्वाभाविक है । इस लक्ष्य को पाने के लिए ही वह भौतिक सुखों की मृग तृष्णा का शिकार होता है । जिस तरह से अग्नि में घी डालने पर वह बुझती तो नहीं है अपितु उसकी लपटें और तेज होती जाती हैं , उसी प्रकार इच्छाओं के भोग से इच्छायें और बढ़ती जाती हैं कदापि शान्त नही होतीं ।

यह सम्पूर्ण जगत् मोहात्मक है , जो त्रिगुणात्मिका अव्यक्त प्रकृति से प्रगट हुआ है । प्रेम का शुद्ध स्वरूप त्रिगुणातीत होता है । जब इस त्रिगुणात्मक जगत में प्रेम नहीं तो आनन्द भी नहीं, क्योंकि आनन्द का स्वरूप तो प्रेम में ही समाहित होता है । आनन्द के बिना शान्ति की कल्पना भी व्यर्थ है ।

भर्तृहरि का कथन है कि हमने भोगों को नहीं भोगा , बल्कि भोगों ने ही हमें भोग डाला । हमने तप नहीं किया बल्कि त्रिविध तापों ने ही हमे तपा डाला । काल की अवधि नहीं बीती , बल्कि हमारी ही उम्र बीत गई । तृष्णा बूढ़ी नहीं हुई , बल्कि हम ही बूढ़े हो गए । (वैराग्य शतक ८)

महर्षि याज्ञवल्क्य अपनी पत्नी मैत्रेयी से कहते हैं कि यदि सम्पूर्ण पृथ्वी को रत्नों से भरकर भी किसी को दे दिया जाए , तो भी उसे शाश्वत शान्ति तथा अमरत्व प्राप्त नहीं हो सकता । इस संसार में अपनी कामना के कारण ही सब कुछ प्रिय होता है । इसलिए एकमात्र परब्रह्म ही देखने योग्य , श्रवण ( ज्ञान ) करने योग्य एवं ध्यान करने योग्य है । उस परब्रह्म को ही जान लेने पर , सुन लेने पर, या देख लेने पर सब कुछ जाना हुआ हो जाता है । (बृहदारण्यक उपनिषद ४/५/३,६)

इसी प्रकार कठोपनिषद् का भी कथन है कि अपनी आत्मा से जिसने परब्रह्म का साक्षात्कार कर लिया है , एकमात्र उनके ही पास शाश्वत सुख है अन्य के पास नहीं । (कठो. २/५/१३)

किन्तु जब तक परब्रह्म के धाम , स्वरूप , लीला, एवं निज स्वरूप का उचित बोध न हो , तब तक आत्म-साक्षात्कार या ब्रह्म-साक्षात्कार की प्रक्रिया सम्पादित नहीं की जा सकती । अतः हमे ब्रह्मज्ञान की शरण में जाना ही पड़ेगा । दर्शन शास्त्र में भी कहा गया है कि जब तक परब्रह्म का शुद्ध ज्ञान नहीं होता , तब तक अखण्ड मुक्ति नहीं होती और अज्ञानता के कारण ही संसार बंधन होता है ।

मानव जीवन का असल लक्ष्य

श्री प्राणनाथ जी का कथन है कि चार अनमोल पदार्थ यथा कलयुग , भारतवर्ष , मनुष्य तन, और ब्रह्मज्ञान (तारतम) पाकर इन्हें व्यर्थ नहीं खोना चाहिए , अपितु प्रत्येक क्षण का सदुपयोग कर अखण्ड धन (परब्रह्म का साक्षात्कार) प्राप्त करना चाहिए । (किरन्तन १२८/४९)

महामुनि कपिल जी सांख्य दर्शन में कहते हैं कि तीनों प्रकार के दुखों (दैहिक, दैविक, भौतिक) से पूर्ण रूप से छूटकर ब्रह्मानन्द को प्राप्त करना ही जीवन का सबसे बड़ा पुरुषार्थ है। (सांख्य १/१)

इसी प्रकार शंकराचार्य जी कहते हैं कि किसी प्रकार इस दुर्लभ मनुष्य जन्म को पाकर और उसमें भी , जिसमें श्रुति के सिद्धान्त का ज्ञान होता है , ऐसा पुरुषत्व पाकर जो मूढ़ बुद्धि अपनी मुक्ति के लिए प्रयत्न नहीं करता है , वह असत् (जड़ प्रकृति) में आस्था रखने के कारण अपने को नष्ट करता है और निश्चय ही वह आत्मघाती है । (विवेक चूड़ामणि ४)

भर्तृहरि जी ने कहा है - "संसार के सुख और भोग बादलों में कौंधने वाली विदयुत के समान अस्थिर हैं । जीवन हवा के झरोकों से लहलहाते कमल के पत्तों पर तैरने वाली पानी की बूँद के समान क्षणभंगुर है । जीवन की उमंगें और वासनाएँ भी अस्थायी हैं । बुद्धिमान को चाहिए कि इन सब बातों को समझकर अपने मन को स्थिरता और धैर्य के साथ ब्रह्म-चिन्तन में लगाये । संसार के नाना प्रकार के सुख-भोग क्षणभंगुर हैं और साथ ही संसार में आवागमन के कारण हैं । इस संसार का कोई भी सुख स्थिर नहीं है , अतः सुख के लिए मारे-मारे फिरना व्यर्थ है । भोगों का संग्रह बन्द करो और अपने आशा रूपी बन्धनों के त्याग से निर्मल हुए मन को अपने आत्म स्वरूप में और परब्रह्म में स्थिर करो । भोगों की ओर से मन को हटाकर परब्रह्म में लगाना ही सर्वोतम कार्य है ।

जीवन जल की उतुंग तरंगों के समान चंचल है । यौवन का सौन्दर्य भी कुछ ही दिनों का मेहमान है । धन-सम्पत्ति हवाई महल के समान है । सुख-भोग वर्षाकालीन विदयुत की चमक के समान क्षण भर की झलक मात्र है । प्रेमिकाओं का आलिंगन भी स्थायी नहीं है । अतः संसार के भय रूपी सागर से पार होने के लिए एकमात्र सच्चिदानन्द परब्रह्म में ही ध्यान लगाओ ।

ब्रह्मानन्द का अनुभव करने वाला मनुष्य ब्रह्मा और इन्द्र आदि देवगणों को भी तिनके के समान तुच्छ समझता है । उस परमानन्द के समक्ष उसे तीनो लोकों का राज्य भी फीका प्रतीत होता है । वास्तविक और विशुद्ध आनन्द तो उसी में है । वह ब्रह्मानन्द तो निरन्तर बढ़ता ही जाता है । उसको छोड़कर और सभी सुख तो क्षणिक ही हैं । अतः सभी को उसी सच्चिदानन्द परब्रह्म में मन लगाना चाहिए ।" ( वैराग्य शतक ३७-४० )

धार्मिक आचरण

मनुस्मृति में धर्म के दस लक्षणों का वर्णन है, जिन्हें आचरण में उतारने वाला व्यक्ति ही धार्मिक कहलाने योग्य है-

धृतिः क्षमा दमोऽस्तेयं शौचं इन्द्रिय निग्रहः । धीः विद्या सत्यमक्रोधो दशकं धर्म लक्षणम् ।।

1. धैर्य - सुख और दुख का चक्र दिन तथा रात्रि की भान्ति बदलता रहता है । एक सामान्य व्यक्ति जहाँ सुख में उन्मत हो जाता है और दुःख में अधीर , वहीं धर्म के स्वरूप में स्थित व्यक्ति दोनों स्थितयों में सम रहता है । सूर्य उगते समय लाल रंग का होता है तथा डूबते समय भी लाल रंग का ही होता है । महापुरुष भी इसी प्रकार सुख-दुःख में सर्वदा सम अवस्था में रहते हैं । गीता का भी यही कथन है कि सुख-दुःख, लाभ-हानि, जय-पराजय, तथा मान-अपमान में अपने को समान अवस्था में रखना चाहिए ।

2. क्षमा - क्षमा अलौकिक गुण है । वह तो महान व्यक्तियों का आभूषण है । निर्बल व्यक्ति क्षमा की राह पर नहीं चल सकता । अति कृपालु परब्रह्म क्षमा का अनन्त भन्डार है । उदाहरण- एक बार जब महावीर स्वामी ध्यान-साधना कर रहे थे तो एक व्यक्ति ने उनके कान में कील ठोक दिया, परन्तु उन्होंने उसे कुछ नहीं कहा । यह उनकी महानता थी ।

3. दम - दम का अर्थ है दमन, अर्थात् मन, चित्त, और इन्द्रियों से विषयों का सेवन न होने देना। अर्थात् अब तक जो इन्द्रियाँ मायावी विषयों का सेवन कर रही थीं, चित्त विषयों के चिन्तन में लगा हुआ था, तथा मन उनके मनन में तल्लीन था, उसे रोक देना दम (दमन) कहलाता है।

कठोपनिषद् का कथन है कि परमात्मा ने पाँच इन्द्रियों (आँख, कान, नाक, जिह्वा, और त्वचा) का निर्माण किया है, जो बाहर के विषयों की ओर ही देखती हैं । एक-एक विषयों का सेवन करने वाले पतंग (रूप), हाथी (स्पर्श), हिरण (ध्वनि), भौंरा (सुगन्ध), और मछली (रस) जब मृत्यु के वशीभूत हो जाते हैं, तो पाँचो इन्द्रियों से पाँचो विषयों का सेवन करने वाले प्रमादी मनुष्य की क्या स्थिति हो सकती है । अमृतत्व की इच्छा करने वाला कोई धैर्यशाली व्यक्ति ही अन्दर की ओर देखता है ।

4. अस्तेय - किसी के धन की इच्छा न करना ही अस्तेय है। योग दर्शन में कहा गया है कि यदि मनुष्य मन, वाणी, तथा कर्म से अस्तेय (चोरी न करना) में प्रतिष्ठित हो जाये, तो उसे सभी रत्नों की प्राप्ति स्वतः ही हो जाएगी (योग दर्शन २/३९) । धार्मिक व्यक्ति के लिए तो पराया धन मिट्टी के समान होता है ।

5. शौच (पवित्रता) - बाह्य और आन्तरिक पवित्रता धर्म का प्रमुख अंग है । बाह्य पवित्रता का सम्बन्ध स्थूल शरीर से है तथा आन्तरिक पवित्रता का सम्बन्ध अन्तःकरण की शुद्धता से है । यह सर्वांश सत्य है कि अन्तःकरण को पवित्र किए बिना आध्यात्मिक मंजिल को प्राप्त नहीं किया जा सकता ।

मनुस्मृति में कहा गया है कि जल से शरीर शुद्ध होता है । सत्य का पालन करने से मन शुद्ध होता है । विद्या और तप से जीव शुद्ध होता है । ज्ञान से बुद्धि शुद्ध होती है । वस्तुतः शौच का यही वास्तविक स्वरूप है ।

6. इन्द्रिय निग्रह - विषयों में फँसी हुई इन्द्रियों को विवेकपूर्वक रोकना ही इन्द्रिय निग्रह है । इन इन्द्रियों के द्वारा कितना ही मायावी सुखों का उपभोग क्यों न किया जाये, मन शान्त नहीं होता, बल्कि तृष्णा पल-पल बढ़ती ही जाती है । इसके लिए हठपूर्वक दमन का मार्ग नहीं अपनाना चाहिए, बल्कि शुद्ध आहार-विहार एवं ध्यान-साधना द्वारा मन-बुद्धि को सात्विक बनाकर ही इन्द्रियों को विषयों से दूर रखा जा सकता है ।

7. बुद्धि - बुद्धि के द्वारा ही ज्ञान ग्रहण किया जा सकता है । बुद्धिविहीन व्यक्ति जब स्वाध्याय और सत्संग का लाभ ही नहीं ले सकता, तो ऐसी स्थिति में आध्यात्मिक उन्नति की कल्पना व्यर्थ है । वस्तुतः शुद्ध बुद्धि को धारण करना भी धार्मिकता का लक्षण है ।

शुद्ध बुद्धि के लिए पूर्ण सात्विक आहार, ध्यान, तथा शुद्ध ज्ञान की आवश्यकता होती है । समाधि की अवस्था में जिस ऋतम्भरा प्रज्ञा (सत्य को ग्रहण करने वाली यथार्थ बुद्धि) की प्राप्ति होती है, उसके द्वारा ब्रह्म साक्षात्कार का मार्ग सरल हो जाता है । बुद्धि के शुद्ध होने पर चित्त तथा मन भी शुद्ध हो जाते हैं, जिससे किसी प्रकार के मनोविकार के प्रकट होने की सम्भावना नहीं रहती ।

8. विद्या - विद्या दो प्रकार की होती है- परा और अपरा । परा विद्या (ब्रह्मविद्या) से उस अविनाशी ब्रह्म को जाना जाता है, जबकि अपरा विद्या से लौकिक सुखों की प्राप्ति होती है । मानव जीवन को सुखी बनाने के लिए दोनों विद्याओं की अपनी-अपनी उपयोगिता है ।

ब्रह्मवाणी (श्री कुलजम स्वरूप) से ही परब्रह्म के यथार्थ स्वरूप व आत्म तत्व को जाना जाता है तथा प्रेम लक्ष्णा भक्ति के द्वारा साक्षात्कार किया जाता है।

9. सत्य - सत्य ही ब्रह्म है, सत्य ही जीवन है, और सत्य ही धर्म का आधार है। तीनों लोक में सत्य से बढ़कर कोई धर्म नहीं है और झूठ के बराबर पाप नहीं है । कबीर जी ने कहा है- "सांच बराबर तप नहीं, झूठ बराबर पाप । जाके हिरदे सांच है, ताके हिरदे आप ।।"

झूठ वर्तमान में कितना ही शक्तिशाली क्यों न प्रतीत हो, अन्ततोगतवा सत्य की ही विजय होती है । योग दर्शन का कथन है कि यदि मन, वाणी, और कर्म से सत्य में स्थित हो जाया जाए, तो वाणी में अमोघता आ जाती है अर्थात् मुख से कुछ भी कहने पर सत्य हो जाता है । सत्य का पालन ही मोक्ष मार्ग का विस्तार करने वाला है ।

10. अक्रोध - धर्मग्रन्थों में कहा गया है कि क्रोध के समान मनुष्य का कोई शत्रु नहीं है, क्योंकि यह मनुष्य के धैर्य, ज्ञान, और सारी अच्छाइयों को नष्ट कर देता है । क्रोध से शारीरिक, मानसिक, तथा आत्मिक उन्नति का द्वार बन्द हो जाता है,। धार्मिक व्यक्ति को तो स्वप्न में भी क्रोध नहीं करना चाहिए ।

अध्यात्म के मूल प्रश्न

यह सम्पूर्ण जड़ जगत प्रकृति में होने वाली विकृति से बना है। इसका निमित्त कारण ब्रह्म है और उपादान कारण प्रकृति। पंचभूतों के द्वारा प्रगट होने वाले ५ विषयों (शब्द, स्पर्श, रूप, रस, बन्ध) के भोग की तृष्णा में प्राणी ८४ लाख योनियों में भटकता रहता है। जब तक चैतन्य (जीव) में प्रकृति के सुखों के भोग की वासना रहेगी, तब तक वह इसे पार करके न तो ब्रह्म साक्षात्कार ही कर पाएगा और न अखण्ड मुक्ति का सुख प्राप्त कर पाएगा।

अपने मूल स्वरूप में जीव शुद्ध और निर्विकार है, किन्तु इस प्राकृतिक जगत में शरीर बन्धन के द्वारा ही उसे विषयों में भटकना पड़ता है। उसे अपनी पूर्ण शुद्ध अवस्था प्राप्त करने के लिए परब्रह्म की उपासना रूप सम्यक् समाधि द्वारा पंचकोश (अन्नमय, प्राणमय, मनोमय, विज्ञानमय, और आनन्दमय) या तीन शरीरों (स्थूल, सूक्ष्म, और कारण) से परे होना पड़ेगा। स्थूल शरीर में ५ स्थूल भूत + १० इन्द्रिय + ५ तन्मात्रा + ४ अन्तःकरण होते हैं। सूक्ष्म शरीर में १० इन्द्रिय + ५ तन्मात्रा + ४ अन्तःकरण होते हैं। कारण शरीर में केवल चार अन्तःकरण चैतन्य के साथ जुड़े होते हैं।

महाकारण स्वरूप में चैतन्य के साथ प्रकृति का सम्बन्ध समाप्त होने लगता है और वह परब्रह्म की कृपा से प्राप्त समाधि द्वारा लौह-अग्निवत् ब्रह्म के साधर्म्य को प्राप्त कर लेता है। उसके इस शुद्ध स्वरूप को हंस कहते हैं। बेहद में रहने वाली ईश्वरी सृष्टि तथा परमधाम में रहने वाली ब्रह्मसृष्टि का मायाविक बन्धन नहीं होता, वह ब्रह्मबोध तथा अनन्य प्रेम लक्षणा भक्ति के सहारे अपने निज घर को प्राप्त कर लेती हैं।

तीनो सृष्टियों में से या तो मैं जीव सृष्टि हूँ या ईश्वरी सृष्टि या ब्रह्मसृष्टि। अनन्य प्रेम लक्षणा भक्ति तथा ब्रह्मज्ञान (तारतम) द्वारा ब्रह्मसृष्टि परमधाम और ईश्वरीसृष्टि बेहद (अक्षरधाम) में चली जाएगी तथा जीवसृष्टि भी वैकुण्ठ-निराकार से परे बेहद में अखण्ड मुक्ति प्राप्त कर लेगी।

क्षर पुरुष (आदिनारायण) का स्वरूप मोह सागर से प्रगट हुआ है। अक्षरब्रह्म की लीला बेहद (अक्षरधाम) में होती है तथा इन सबसे परे सच्चिदानन्द परब्रह्म का स्वरूप परमधाम के कण-कण में विराजमान है। इस नश्वर जगत के कण-कण में ब्रह्म नहीं, उनकी सत्ता मात्र है। संक्षेप में कालमाया के इस ब्रह्माण्ड से परे योगमाया है, जिसके परे परमधाम है।

साकार स्वरूप या तो देवी-देवताओं और महापुरुषों का है, या कार्य रूप स्थूल जड़ जगत का। निराकार स्वरूप कारण रूप जड़ प्रकृति, महत्तत्व, अहंकार, आकाश, और वायु का है। सच्चिदानन्द परब्रह्म का स्वरूप साकार और निराकार से परे शुद्ध स्वरूप और त्रिगुणातीत है, जिसे वेद में भर्गः, आदित्यवर्ण आदि तथा कुरआन पक्ष में नूर शब्द से सम्बोधित किया गया है।

प्रेम के अन्दर ही आनन्द का स्वरूप विराजमान होता है । अतः सच्चिदानन्द अक्षरातीत परब्रह्म की लीला प्रेममयी और आनन्दमयी है । वह इस जगत के सुख और दुख की लीला नहीं करते हैं ।

सच्चा धर्म कौन सा है ?

महर्षि कणाद ने वैशेषिक दर्शन में कहा है कि जिससे लौकिक उन्नति के साथ-साथ मोक्ष की भी प्राप्ति हो, वह ही धर्म है । महाभारत का कथन है कि धर्म ही सम्पूर्ण प्राणिमात्र को धारण करने वाला है । इस कथन का यह स्पष्ट भाव है कि धर्म के बिना मानव अपनी गरिमा भूल कर पशुत्व के स्तर पर आ जाएगा ।

धर्म और सम्प्रदाय को एक ही समझना बहुत बड़ी भूल है । धर्म एक वृक्ष है और सम्प्रदाय उसकी शाखायें । धर्म के शाश्वत सत्य को महापुरुषों ने जितना आत्मसात् किया, उतने सत्य को महापुरुषों ने कालांतर में सम्प्रदाय का रूप दे दिया । सबका आध्यात्मिक स्तर समान न होने से एक ही परम सत्य के सम्बन्ध में भिन्न-भिन्न विचारधारायें बन गईं, जिसने आज विद्वेष का रूप ले लिया है ।

वर्तमान समय में वैदिक (हिन्दू) धर्म में लगभग १००० सम्प्रदाय हैं, जिनमे से लगभग ७०० सम्प्रदाय ऐसे हैं जिनका किसी मान्य ग्रन्थ से स्पष्ट और सत्य दार्शनिक आधार नहीं है। शेष ३०० सम्प्रदायों में से अधिकतर ऐसे हैं , जो अपने सिद्धांतों को आर्ष ग्रन्थों से पूर्णरूप से प्रमाणित नहीं कर पाते । यहाँ तक कि कुछ अपने को अलग धर्म मानते हैं ।

वस्तुतः अध्यात्म ज्ञान के जिज्ञासु को आठ प्रमाणों से सत्य-असत्य की परीक्षा करनी चाहिए- १. प्रत्यक्ष २. अनुमान ३. उपमान ४. शब्द ५. ऐतिहय ६. अर्थापत्ति ७. संभव ८. अभाव । यहाँ ध्यान रखने योग्य बात है कि यदि ७ प्रमाण एक तरफ हों और शब्द प्रमाण (अपौरुषेय ग्रन्थ का कथन) उनके विपरीत हो, तो भी शब्द प्रमाण को ही सत्य माना जाता है ।

पूर्ण वास्तविकता यह है कि वर्तमान विश्व में प्रचलित सभी धर्मों को तो पन्थ या सम्प्रदाय ही कहा जा सकता है, क्योंकि धर्म तो एक ही है- सत्य । सत्य धर्म ही एकमात्र धर्म है, जो एक परब्रह्म परमात्मा का मार्ग दिखाता है । सभी पन्थ (जिन्हें धर्म कहा जाता है, उदाहरणार्थ- हिन्दू, मुस्लिम, ईसाई आदि) तो उसी सत्य धर्म की शाखाएँ हैं, जो विभिन्न भाषाओं में उस एक सच्चिदानन्द परमात्मा का मार्ग दिखाते हैं ।

शतपथ ब्राह्मण का कथन है कि जो एक परब्रह्म को छोड़कर अन्य की भक्ति करता है , वह विद्वानों में पशु के समान है (शतपथ ब्राह्मण १४/४/२/२२) । महापुरुषों व देवी-देवताओं की भक्ति नहीं , अपितु उनके गुणों का अनुसरण करना चाहिए । वेद का कथन है कि उस अनादि अक्षरातीत परब्रह्म के समान न तो कोई है , न हुआ है और न कभी होगा । इसलिए उस परब्रह्म के सिवाय अन्य किसी की भक्ति नहीं करनी चाहिए (ऋग्वेद ७/३२/२३) ।

अन्ततः , सत्य , अपौरुषेय ब्रह्मज्ञान (तारतम) को प्राप्त कर एक परमात्मा की भक्ति करना ही सत्य धर्म का पालन करना है ।



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सदगुरु की पहचान

संसार सदगुरु और गुरु में भेद नहीं जानता ।

गुरु उसे कहते हैं जो अन्धकार से प्रकाश की ओर ले जाए। प्रथम गुरु माता है जो शैशव का पालन करती है। द्वितीय गुरु पिता हैं। तद्पश्चात् आचार्य को गुरु माना गया है, जो अपने शिष्य को ज्ञान का प्रकाश देकर उन्नति का मार्ग दिखाता है। फिर सदगुरु किसे कहते हैं?  

सदगुरु उन्हें कहते हैं, जो धर्मग्रन्थों का सार निकालकर भक्ति का मार्ग सुनिश्चित करें तथा निज स्वरूप और सच्चिदानन्द परमात्मा का ज्ञान देकर मोक्षमार्गी बनाये । सदगुरु की महिमा के विषय में ठीक ही कहा गया है-

यह तो बात प्रगट है साधो, शिव सुकमुनि श्रुति गाई । बिना सदगुरु कोई पार ना पावे, कोट करे चतुराई ।।

गुरु कंचन गुरु पारस , गुरु चन्दन परमान । तुम सदगुरु दीपक भए , कियो जो आप समान ।।

अर्थात् गुरु शुद्ध कंचन के समान उज्जवल चरित्र वाला या पारस मणि की भांति लोहे समान शिष्य को स्वर्ण समान परमार्थी बनाने वाला होता है । या फिर वह चन्दन के समान चारों ओर अपने गुणों की सुगन्धि फैलाता है । परन्तु सदगुरु तो दीपक के समान होते हैं, जो अपनी शरण में आने वाले को भी अपने समान बना देते हैं ।

परमात्मा की प्राप्ति का पहला चरण है सदगुरु को ढूंढना ।

श्री प्राणनाथ जी ने कहा है-

हे सन्त जनों ! इस दुनिया में अनेकों ने परब्रह्म को पाने के लिए सदगुरु की बड़ी खोज की । आप भी उस सदगुरु की खोज कीजिए । खोजते-खोजते जब सदगुरु से मिलन हो जाएगा, तब परब्रह्म भी अवश्य मिल जाएँगे । (किरन्तन २६/१)

सदगुरु किसे माना जाये ? उनकी पहचान कैसे हो ?

इस विषय पर अक्षरातीत श्री प्राणनाथ जी कहते हैं -

शास्त्रों और पुराणों के विद्वानों, तरह-तरह की वेशभूषा धारण करने वाले महात्माओं, और विभिन्न पन्थों में तुम भले ही खोजते रहो, लेकिन सदगुरु का स्वरूप नहीं मिलेगा । सदगुरु का स्वरूप इन सबसे अलग ही होता है । वास्तविक सदगुरु तो इस कलयुग में कहीं एक ही होगा । (किरन्तन ५/७)

जिसे आप सदगुरु मानकर सेवा करते हैं, उनसे जाकर केवल इतनी सी बात पूछिए कि महाप्रलय या शरीर छोड़ने के बाद हमारा मूल घर कहाँ होगा । (किरन्तन १०/३)

सदगुरु वही है जो धर्मग्रन्थों द्वारा वास्तविक सत्य को प्रकट करे । सभी धर्मग्रन्थों का मूल आशय एक ही होता है । सभी मनीषियों के कथनों में एकरूपता होती है, लेकिन अज्ञानी लोग अलग-अलग समझते हैं । (किरन्तन ३/४)

वेद, उपनिषद, दर्शन, सन्त वाणी, कुरान, तथा बाइबल इत्यादि में एक ही परब्रह्म को अनेक प्रकार से बताया गया है । छः शास्त्रों के रचनाकारों ने सृष्टि बनने के छः कारणों की अलग-अलग व्याख्या की है । उसमें तत्वतः कोई भेद नहीं है, किन्तु अल्पज्ञ लोग भेद मानकर लड़ते रहते हैं । सत्यदृष्टा मनीषियों का कथन सभी कालों में समान ही होता है ।

हे सन्तजनों ! सदगुरु केवल वही हैं जो उस परब्रह्म का साक्षात्कार कराये, जिसे आज तक कोई मन, बुद्धि से प्राप्त नहीं कर सका है । वह ही हद (नश्वर ब्रह्माण्ड) तथा बेहद (अखण्ड भूमि) का ज्ञान दे सकता है और मन के सभी संशयों को समाप्त कर सकता है । (किरन्तन ४/१२)

सदगुरु वही है, जो आत्म स्वरूप की पहचान कराये तथा माया (नश्वर जगत), धाम धनी, और निजधर का बोध कराये । ऐसे सदगुरु की कृपा से ही आखिरत (महाप्रलय) की पहचान होती है, जिससे जीव परब्रह्म के चरणों में जाकर अखण्ड मुक्ति का अवसर प्राप्त करता है । (किरन्तन १४/११)

परमात्मा एक है

पूर्ण ब्रह्म सच्चिदानन्द तो एक ही हैं, किन्तु लोगों ने अलग-अलग अनेक परमात्मा की कल्पना कर ली है । देवी-देवताओं की मूर्तियों की पूजा तो दूर की बात है, आजकल तो पीरों-फकीरों की कब्रों, पेड़, पौधों तथा नदियों के पूजन की परम्परा चल पड़ी है।

मर्यादा पुरुषोत्तम श्री राम ने ऋषिकेश में तप किया था। शिव जी सदैव ध्यान-समाधि में लीन रहते हैं । महाभारत में योगेश्वर श्री कृष्ण के द्वारा संध्या किये जाने का वर्णन है । भला ये सब किसका ध्यान-वन्दना करते रहे हैं ?

वेद का कथन है कि उस अनादि अक्षरातीत परब्रह्म के समान न तो कोर्इ है, न हुआ है, और न कभी होगा। इसलिये उस परब्रह्म के सिवाय अन्य किसी की भी भक्ति नहीं करनी चाहिए। (ऋग्वेद ७/३२/२३)

वेद में कहा गया है कि एक ही अद्वितीय ब्रह्म को मेधावीजन इन्द्र, मित्र, वरुण, अग्नि, सुपर्ण, गरूत्मान्, दिव्य, यम, मातरिश्वा आदि अनेक नामों से कहते हैं (अथर्ववेद ९/१०/२८) । उस एक सत्यस्वरूप ब्रह्म के विभिन्न गुणों के आधार पर विभिन्न नाम माने गये हैं । वेद में किसी भी देवी-देवता की स्तुति नहीं है । उस ब्रह्म को अखिल ऐश्वर्ययुक्त होने के कारण इन्द्र , सबके लिए प्रीति का प्रात्र होने के कारण मित्र , सबसे श्रेष्ठ होने से वरुण , ज्ञान स्वरूप होने से अग्नि , उत्तम पालन युक्त गुणों से पूर्ण होने से सुपर्ण , महान स्वरूप वाला होने से गरूत्मान् , तथा प्रकाशमय होने से दिव्य कहा जाता है । उस ब्रह्म को ही सबका नियामक होने के कारण यम तथा अनन्त बलयुक्त होने के कारण मातरिश्वा नाम से जाना जाता है ।

शतपथ ब्राह्मण का कथन है कि जो एक परब्रह्म को छोड़कर अन्य की भक्ति करता है , वह विद्वानों में पशु के समान है (श. ब्र. १४/४/२/२२) । वर्तमान हिन्दू मान्यताएँ , जिसमें अनेक देवी-देवताओं की पूजा का विधान है , वैदिक सिद्धान्तों के सर्वथा विपरीत हैं । ग्रन्थों का गलत अर्थ करने से ही इस प्रकार की गलत धारणाओं ने समाज को जकड़ लिया है। ब्रह्म के अतिरिक्त किसी अन्य पंचभौतिक शरीरधारी देवी-देवता की स्तुति मान्य नहीं है । श्रुतियों द्वारा गान किया गया है कि "एको ब्रह्म द्वितीयो नास्ति" अर्थात् परमात्मा तो सर्वकाल में मात्र एक और अद्वितीय है और सर्वत्र उसी को उपास्य माना गया है । सिख गुरु श्री नानक जी ने कहा है- "नानक एको सुमरिए" अर्थात् उस एक परब्रह्म का ध्यान करना चाहिए ।

इसी प्रकार मुस्लिम ग्रन्थों में कहा गया है- "कुलहू अल्ला अहद" अर्थात् खुदा एक है । क़ुरआन में कहा गया है - "वह अल्लाह है जिसके अलावा अन्य कोई भी पूज्य नहीं है । वह पर्दे के पीछे व सामने का ज्ञाता है । वह अत्यन्त कृपाशील (रहमान) और दयावान है । वह अल्लाह है, वह सर्वशासक है, वह अत्यन्त गुणवान, शान्ति स्वरूप, शरण दाता, संरक्षक, प्रभुत्वशाली, और अत्यन्त महान है ।" (पारा २८ सूरत ५९ आयत २२,२३,२४)

बाइबल में कहा गया है - परमात्मा एक ही है, कोई दूसरा नहीं (मार्क १३/३२) । एकमात्र परमात्मा ही हमारा स्वामी है और तुम्हें उससे अपने सम्पूर्ण हृदय, आत्मा, मस्तिष्क, और सम्पूर्ण शक्ति से प्रेम करना चाहिए (मार्क १२/२९,३०) ।

निष्कर्ष-

सच्चिदानन्द स्वरूप परमात्मा एक ही है । वह वैकुण्ठ, निराकार, क्षर (नासूत) से परे योगमाया, अक्षर ब्रह्माण्ड (जबरूत) से भी परे दिव्य ब्रह्मपुर, परमधाम (लाहूत) में विराजमान हैं । वह देवी-देवताओं, त्रिदेव, व अक्षर ब्रह्म से भी परे हैं तथा उन्हें ही परब्रह्म, प्राणनाथ, अक्षरातीत, नूरजमाल, अल्लाह, खुदा, The Lord आदि नामों से पुकारा जाता है ।

परब्रह्म कहाँ है?

सम्पूर्ण अध्यात्म जगत परब्रह्म को सर्वज्ञ और अखण्ड मानता है और यह वास्तविकता भी है , किन्तु सर्वज्ञ और अखण्ड सिद्ध करने के लिए परब्रह्म को इस सृष्टि के कण-कण में व्यापक तथा सूक्ष्म से सूक्ष्म मानना पड़ेगा । यहीं से निराकारवाद का सिद्धान्त लागू हो जाता है ।

इस मायावी सृष्टि के कण-कण में सच्चिदानन्द परब्रह्म को सर्वव्यापक मानने पर ये प्रश्न उपस्थित होते हैं-

1. यह सम्पूर्ण जड़ जगत चेतन, अखण्ड, और अविनाशी होना चाहिए ।

2. इस जगत के कण-कण से लौह अग्निवत् ब्रह्मरूपता की झलक मिलनी चाहिए ।

3. प्रत्येक प्राणी पूर्ण ज्ञानवान होना चाहिए । न तो धर्मशास्त्रों की आवश्यकता होनी चाहिए और न पढ़ने पढ़ाने की ।

4. प्रत्येक प्राणी तथा प्रत्येक कण आनन्द से परिपूर्ण होना चाहिए , जबकि व्यवहार में तो यही दिखता है कि प्रत्येक प्राणी किसी न किसी रूप में दुखी है ।

5. स्वर्ग , वैकुण्ठ तथा नरक में किसी भी प्रकार का अन्तर नहीं होना चाहिए , क्योंकि ब्रह्म अखण्ड और एकरस है ।

6. किसी भी प्राणी के अन्दर काम , क्रोध , लोभ , मोह तथा अहंकार आदि दुर्गुण नहीं होने चाहिए ।

7. इस संसार में जन्म तथा मृत्यु का चक्र नहीं चलना चाहिए ।

8. मल-मूत्र आदि से भी हमें घृणा के स्थान पर ब्रह्मरूपता की अनुभूति होनी चाहिए ।

9. भक्ति और मुक्ति जैसे शब्दों की आवश्यकता ही नहीं होनी चाहिए ।

10. ब्रह्मरूपता वाली सृष्टि में जगत की उत्पत्ति एवं प्रलय की बात मात्र काल्पनिक होनी चाहिए ।

जिस प्रकार अन्धेरे के कण-कण में सूर्य व्यापक नहीं हो सकता, उसी प्रकार इस मायावी जगत के कण-कण में सच्चिदानन्द परब्रह्म का वह अखण्ड प्रकाशमान (नूरमयी) स्वरूप व्यापक नहीं हो सकता । इस जगत के कण-कण में उसकी सत्ता अवश्य है , किन्तु स्वरूप नहीं ।

श्री प्राणनाथ जी का कथन है-

हद पार बेहद है , बेहद पार अछर । अछर पार वतन है , जागिए इन घर ।। (प्रकास हि. ३१/१६५)

इस हद के ब्रह्माण्ड से परे बेहद का मण्डल है । इसके अन्तर्गत अक्षर ब्रह्म के चारों पाद- सत्स्वरूप, केवल, सबलिक, और अव्याकृत हैं । मूल तत्व सच्चिदानन्द पूर्ण ब्रह्म अक्षरातीत हैं, जो अक्षर से भी परे हैं ।

परब्रह्म सर्वव्यापक अवश्य है किन्तु अपने निजधाम में, जहाँ के कण-कण में अनन्त सूर्यों का प्रकाश है, जहाँ अनन्त आनन्द है (ऋग्वेद ९/११३/७) । गीता में भी कहा गया है कि उस ब्रह्मधाम में न तो सूर्य प्रकाशित होता है, न चन्द्रमा, और न ही अग्नि । जहाँ जाने पर पुनः लौटना नहीं पड़ता, वह मेरा परमधाम है ।

प्रकृति के अन्धकार से सर्वथा परे सूर्य के समान प्रकाशमान स्वरूप वाले परमात्मा को मैं जानता हूँ, जिसको जाने बिना मृत्यु से छुटकारा पाने का अन्य कोई भी उपाय नहीं है (यजुर्वेद ३१/१८) । इसी प्रकार ब्राह्मण ग्रन्थों का भी कथन है कि हे परब्रह्म ! मुझे इस असत्य (जगत) से सत्य (अपने अखण्ड स्वरूप) की ओर ले चलो । तमस् (प्रकृति के अन्धकार) से प्रकाश (निजधाम) की ओर ले चलो । मृत्यु (लौकिक जगत) से मुझे अमरत्व (ब्रह्मधाम) में ले चलो (शतपथ ब्राह्मण १४/३/१/३०) ।

यदि सच्चिदानन्द परब्रह्म का स्वरूप इस नश्वर जगत के कण-कण में व्यापक होता, तो वेद और ब्राह्मण ग्रन्थों का कथन इस प्रकार नहीं होता । ब्रह्म इस सृष्टि का निमित्त कारण है , प्रकृति उपादान कारण है । जिस प्रकार निमित्त कारण कुम्भकार उपादान कारण मिट्टी से बने हुए घड़े के कण में नहीं बैठा होता , बल्कि घड़े के कण-कण से उसकी कारीगरी दिखती है, उसी प्रकार निमित्त कारण ब्रह्म इस सृष्टि के कण-कण में निज स्वरूप से नहीं है बल्कि इस जगत के कण-कण में उसकी सत्ता समायी हुई है ।

उपनिषद में स्पष्ट रूप कहा गया है कि अमृतस्वरूप दिव्य ब्रह्मपुर में परब्रह्म स्थित है (मुण्डकोपनिषद् २/२/७) । प्रकृति से परे उस अविनाशी योगमाया के ब्रह्माण्ड में आगे-पीछे, ऊपर-नीचे, सर्वत्र कण-कण में अक्षर ब्रह्म का नूरमयी स्वरूप है । इसी प्रकार परमधाम में अनादि अक्षरातीत पूर्ण ब्रह्म का स्वरूप कण-कण में है । (मुण्डकोपनिषद् २/११/४३)

वेद के कथनानुसार- यह सम्पूर्ण जगत ब्रह्म के चौथे पाद (अव्याकृत) द्वारा बना है । इसके तीनों पाद चेतन, प्रकाशमय, और अखण्ड हैं । परब्रह्म का स्वरूप इन तीनों पादों से भी परे उस स्थान पर है, जिसे परमधाम (दिव्य ब्रह्मपुर) कहते हैं ।

परब्रह्म का स्वरूप कैसा है?

परब्रह्म के स्वरूप के सम्बन्ध में दो प्रकार की विचारधारायें हैं ।

पहली मान्यता-

परब्रह्म साकार हैं । अतः श्री नारायण (विराट पुरुष), कृष्ण, राम, शिव, विष्णु, हनुमान, दुर्गा आदि के रूप में उनकी पूजा-आराधना की जाती है ।

इस प्रकृति में पाँच भूतों से युक्त किसी पदार्थ को साकार कहते हैं । किन्तु महाप्रलय में जब प्रकृति ही लय हो जाती है, तो लोक-लोकांतर (स्वर्ग, वैकुण्ठ आदि) अथवा देवी-देवताओं (त्रिदेव, नारायण आदि) के अस्तित्व का प्रश्न ही नहीं है । साथ ही, यह विचारधारा वेद, उपनिषद, और दर्शन शास्त्रों के अनुकूल नहीं है ।

अतः परब्रह्म साकार नहीं हो सकते ।

दूसरी मान्यतानुसार-

परब्रह्म निराकार हैं । इस विचारधारा के अनुसार- परब्रह्म सर्वव्यापक, निर्गुण, और निराकार हैं तथा ध्यान द्वारा उनका अनुभव किया जाता है ।

महत्तत्व का स्वरूप इतना सूक्ष्म होता है कि सामान्य मानवीय बुद्धि उसे ग्रहण ही नहीं कर पाती, जिस कारण उसे निराकार कहते हैं । निराकार की उत्पत्ति होती है तथा महाप्रलय में उसका नाश भी होता है, परन्तु परमात्मा तो चेतन, अनादि, व अखण्ड हैं ।

जब वेद का कथन है कि परब्रह्म सूर्य के समान प्रकाशमान है, तो उसे रूप रहित कैसे कहा जा सकता है? वस्तुत: निराकार का अर्थ होता है, आकार से रहित, न कि रूप से रहित। वेद के अनेक मन्त्रों में उसे अत्यधिक सुन्दर तथा तेजोमय कहा गया है, किन्तु वह स्वरूप पंचभूतात्मक रूप से सर्वथा भिन्न है एवं नस, नाड़ी, रक्त, मांस से रहित है।

वेदों में कहीं भी परब्रह्म के लिए "निराकार" शब्द नहीं है, अपितु ब्रह्म को सर्वज्ञ माना गया है । विद्वानों के अनुसार ब्रह्म सर्वज्ञ तभी हो सकता है , यदि वह प्रकृति के अन्दर सर्वत्र हो , क्योंकि एकदेशीय अल्पज्ञ होता है । जो सर्वत्र विद्यमान होगा, वह सर्वव्यापक होगा । अतः उसे सूक्ष्मतम और निराकार माना गया । परन्तु यदि एक सिद्ध योगी हजारों कि.मी. दूर से किसी भी स्थान का ज्ञान प्राप्त कर सकता है, तो परब्रह्म अपने धाम में स्थित रहकर सर्वज्ञ क्यों नहीं हो सकता ?

धर्मग्रन्थों में ब्रह्म को व्यापक कहने का आशय यह है कि उसका स्वरूप प्रकृति से परे योगमाया के ब्रह्माण्ड के कण-कण में व्यापक है । इसी प्रकार अक्षरातीत पूर्णब्रह्म का स्वरूप परमधाम के कण-कण में व्यापक है ।

अतः परब्रह्म निराकार नहीं हो सकते ।

वस्तुतः साकार और निराकार से परे ब्रह्म का स्वरूप है, जो त्रिगुणातीत है ।

वेद में कहा है- उस धीर, अजर, अमर, नित्य तरुण परब्रह्म को ही जानकर विद्वान पुरुष मृत्यु से नहीं डरता है (अथर्ववेद १०/८/४४ ) । इस मन्त्र में अक्षरातीत पूर्ण ब्रह्म को नित्य तरुण (युवा स्वरूप वाला) कहा गया है, किन्तु उसका शरीर मनुष्यों के पंचभौतिक शरीर के लक्षणों से सर्वथा विपरीत है । ब्रह्म के युवा स्वरूप वाले शरीर में हड्डी, माँस, रस, रक्त तथा नस-नाड़ियाँ नहीं हैं । श्वास-प्रश्वास की क्रिया उनमें नहीं होती है और क्षुधा भी उसको नहीं सताती है । न उसमें रंच मात्र भी ह्रास होता है और न विकास । अनादि काल से उसका स्वरूप वैसा ही है और अनन्त काल तक रहेगा ।

वेदों में अन्य मन्त्रों में ब्रह्म के लिए शुक्र (नूर), भर्गः, आदित्यवर्णः, कान्तिमान, मनोहर, प्रकाशमान आदि शब्दों का प्रयोग किया गया है । कान्ति एवं प्रकाश का मूल स्त्रोत कोई न कोई अलौकिक स्वरूप अवश्य होना चाहिए।

श्री तारतम वाणी में परब्रह्म के स्वरूप का कितना सुन्दर वर्णन है-

नूर को रूप सरूप अनूप है , नूर नैना निलवट नासिका नूर । नूर श्रवन गाल लाल नूर झलकत , नूर मुख हरवटी नूर अधूर ।। (किरन्तन ११४/१)

अक्षरातीत श्री राज जी का स्वरूप उपमा से रहित नूरमयी है । उनके नेत्र , मस्तक और नासिका भी नूरी छवि वाली है । उनके सुन्दर कानों तथा लाल गालों से हमेशा ही नूर झलकता रहता है । उनका मुखारविन्द, ठुड्ढी, और लाल होंठ भी नूरमयी ही हैं ।

सामवेद में कहा है कि जो अपने गृह रूपी चेतन धाम में सम्यक् प्रदीप्त होकर चमकता है, उस अत्यन्त तरुण, अदभुत प्रभा वाले, अपने चेतन धाम में सर्वत्र व्यापक, महान, पृथ्वी, और दयुलोक के बीच उत्तम प्रकार से स्तुति किए गए ब्रह्म को हम महानम्रता द्वारा प्राप्त हुए हैं (साम. ५/८/९/१) । जो ब्रह्म का स्वरूप है, वही उसके धाम का भी स्वरूप है । अक्षरातीत पूर्णब्रह्म का स्वरूप जिस प्रकार नूरमयी और प्रेममयी है, उसी प्रकार सम्पूर्ण परमधाम भी नूरमयी और प्रेममयी ही है ।

यजुर्वेद में कहा गया है कि वह ब्रह्म नूरमयी ज्योति वाला है । अथर्व वेद में उन्हें कान्तिमान, मनोहर, नित्य तरुण कहा गया है । क़ुरआन में उनकी अमरद सूरत का बयान है । ऐसा सर्वश्रेष्ठ परब्रह्म ही एकमात्र उपास्य है ।

अन्ततः श्री प्राणनाथ जी द्वारा प्रदत्त तारतम ज्ञान का अनुसरण किये बिना परब्रह्म को पाने का कोई अन्य मार्ग नहीं है ।



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