श्री तारतम वाणी

या बानी के कारने, कई गले हेम। या बानी के कारने, कई लेवे अंनसन नेम।।

महामत कहे सुनो साथ, देखो खोल बानी प्राणनाथ। धनी ल्याए धामसे वचन, जिनसे न्यारे न होए चरन।।

श्री तारतम वाणी - एक परिचय

अक्षरातीत परब्रह्म, उनके अखण्ड धाम, व लीला का ज्ञान देने वाली यह ब्रह्मवाणी है । साक्षात् अक्षरातीत श्री प्राणनाथ जी के मुखारविन्द से अवतरित होने के कारण इसे श्री मुख वाणी या स्वसं वेद कहते हैं । अन्धकार को चीरकर अखण्ड ज्ञान का प्रकाश प्रस्फुटित करने वाली इस विद्या को तारतम (तारतम्य) वाणी भी कहते हैं । इसका एक नाम श्री क़ुल्ज़ुम स्वरूप भी है, जिसे बोलचाल की भाषा में श्री कुलजम स्वरूप कहते हैं ।

श्री कुलजम स्वरूप का ज्ञान इस संसार में विद्यमान अपौरुषेय ग्रन्थ (वेदादि), उनके व्याख्या ग्रन्थ, तथा महापुरुषों की वाणी से भिन्न है । श्रेष्ठतम ग्रन्थ भी अधिक से अधिक ज़िबरील फरिश्ते या अक्षर ब्रह्म की कृपा से बोले गए हैं, जबकि यह वाणी स्वयं युगल स्वरूप अक्षरातीत द्वारा कही गई है । इसमें कहीं भी मानवीय बुद्धि (स्वाप्निक बुद्धि) का प्रवेश नहीं है ।

वाणी मेरे पिऊ की , न्यारी जो संसार । निराकार के पार थे , तिन पार के भी पार ।। (प्रकास हि. ३७/३)

श्री इन्द्रावती जी की आत्मा स्वयं इस वाणी का परिचय देते हुए कहती हैं कि यह वाणी मेरे प्रियतम श्री प्राणनाथ जी ने कही है जो इस संसार से परे का ज्ञान देती है । इस वाणी में निहित ज्ञान निराकार से परे अखण्ड योगमाया, उससे परे अक्षर ब्रह्म, तथा उनसे भी परे अक्षरातीत श्री प्राणनाथ जी का ज्ञान देती है ।

सम्वत् १७१२ में युगल स्वरूप (अक्षरातीत श्री राज जी व उनकी आनन्द अंग श्री श्यामा जी) श्री देवचन्द्र जी के तन को त्यागकर श्री मिहिरराज (आत्मा श्री इन्द्रावती जी) के तन में आकर विराजमान हो गए । तत्पश्चात् ब्रह्मवाणी श्री कुलजम स्वरूप का अवतरण पूर्णब्रह्म अक्षरातीत के श्रीमुख से प्रारम्भ हो गया, जिसे साथ बैठे अन्य सुन्दरसाथ लिखते गए ।

श्री मुख वाणी का अवतरण काल सम्वत् १७१२ से १७५१ तक है । सम्वत् १७१२ से जो वाणी गुप्त रूप से उतरनी प्रारम्भ हुई, उसमें 'मिहिरराज' की छाप है । सम्वत् १७१५ से हब्से में प्रत्यक्ष रूप से ब्रह्मवाणी का अवतरण प्रारम्भ हुआ, जिसमें 'इन्द्रावती' की छाप है । सम्वत् १७३२ से 'महामति' के नाम से ब्रह्मवाणी उतरनी प्रारम्भ हो गयी ।

श्री कुलजम स्वरूप में कुल १४ ग्रन्थ, ५२७ प्रकरण, व १८७५८ चौपाइयाँ हैं । इस वाणी के प्रारम्भिक चार ग्रन्थों- रास, प्रकास, खटरूती, व कलस में हिन्दू पक्ष का ज्ञान है । सनंध, खुलासा, मारफत सागर, व कयामतनामा में कतेब पक्ष का ज्ञान है तथा खिलवत, परिकरमा, सागर, सिनगार, व सिंधी में परमधाम का ज्ञान है । किरन्तन ग्रन्थ में सभी विषयों का समिश्रण है ।

बिना हिसाबें बोलियां , मिने सकल जहान । सबको सुगम जान के , कहूंगी हिन्दुस्तान ।। (सनंध १/१५)

श्री महामति जी कहती हैं कि इस संसार में बहुत सारी बोलियां (भाषाएं) हैं । परन्तु इनमें हिन्दुस्तानी भाषा को सबसे सरल जानकर इस भाषा में ही अपनी वाणी कहूंगी । यह ज्ञान हिन्दुस्तानी भाषा में ही अवतरित हुआ, जिससे अभिप्राय भारत में बोली जाने वाली प्रादेशिक भाषाओं से है ।

अक्षरातीत श्री राज जी के हृदय में ज्ञान के अनन्त सागर हैं । उनकी एक बूँद महामति जी के धाम-हृदय में आयी, जो सागर का स्वरूप बन गई । ज्ञान के सागर के रूप में यह तारतम वाणी है जो मारिफ़त के ज्ञान का सूर्य है । यह ब्रह्मवाणी सबके हृदय में ब्रह्मज्ञान का उजाला करती है ।

उपनिषद् में कहा गया है कि पराविद्या के द्वारा ही अक्षर ब्रह्म को जाना जाता है (मु. उ. १/५) । क़ुरआन में भी लिखा है कि इल्म-ए-लद्दुन्नी (श्री कुलजम स्वरूप) के आये बिना अर्श-ए-अज़ीम (परमधाम) और अल्लाह तआला (अक्षरातीत परब्रह्म) के राज़ (रहस्य) कोई नहीं बता सकता ।

किन एक बूंद न पाइया , रसना भी वचन । ब्रह्माण्ड धनियों देखिया , जो कहावे त्रैगुन ।। (प्र. हि. ३१/१०१)

तीनों लोक (पृथ्वी, स्वर्ग, वैकुण्ठ) के स्वामी ब्रह्मा, विष्णु, व शिव तथा तीनों गुण (सत्व, रज, तम) से निर्मित इस ब्रह्माण्ड में किसी ने भी अखण्ड परमधाम के ज्ञान के सागर की एक बूंद भी नहीं पाई । यह सब तो अक्षर ब्रह्म को भी नहीं जान सके ।

या वानी के कारने , कई करें तपसन । या वानी के कारने , कई पीवें अगिन ।। (प्र. हि. ३१/९५)

तारतम वाणी में निहित ज्ञान को पाने के लिए कइयों ने सात कल्पांत तक तपस्या की । कइयों ने अग्निपान किया । बहुत लोगों ने इस ज्ञान के लिए बड़ी-बड़ी साधनाएँ की, कुछ ने उपवास के कठोर नियम लिए, कइयों ने पहाड़ों की बर्फ में तप करते हुए अपना शरीर गला लिया, और कुछ ने इस कठिन लक्ष्य के लिए अपनी देह का दमन कर दिया।

आज लों इन इण्ड में , कबहूं काहू सुनी न कान । कई हुए इण्ड कई होवहीं , पर काहू न बोए पहिचान ।। (बीतक ७१/४)

अनादि काल से यह माया का नश्वर ब्रह्माण्ड बनता चला आ रहा है तथा अनन्त काल तक इसी प्रकार बनता-मिटता रहेगा । प्रत्येक सृष्टि में खरब-शंख से भी अधिक संख्या में प्राणी जन्म-मरण के इस चक्र (खेल) में उलझे रहते हैं, तत्पश्चात् प्रलय में समाप्त हो जाते हैं । परन्तु आज से पहले न तो अक्षर ब्रह्म को कोई जान पाया था, न ही आगे आने वाले ब्रह्माण्डों में कभी कोई जान सकेगा । ब्रह्मवाणी के अवतरण का सौभाग्य तो मात्र इसी ब्रह्माण्ड को प्राप्त हुआ है ।

श्री प्राणनाथ जी की कृपा से ही यह अखण्ड परमधाम का ज्ञान इस ब्रह्माण्ड में अवतरित हुआ । जिस ज्ञान को ढूंढते हुए ब्रह्माण्ड के स्वामी योगमाया (सबलिक ब्रह्म) से परे नहीं जा सके, श्री जी ने ऐसे अलौकिक ज्ञान को संसार के साधारण जीवों को भी उपलब्ध करा दिया है । इस वाणी की कृपा से ही संसार को अक्षरातीत परब्रह्म के धाम, स्वरूप, व लीला का बोध हो सका। जो जगत अक्षर ब्रह्म को भी नहीं पा सका था, उसे साक्षात् परमात्मा के साक्षात्कार करने का सौभाग्य प्राप्त हुआ है ।

परमधाम की आत्माओं के लिए इस वाणी का अलग महत्व है । जैसा कि बाइबल में कहा गया है कि परमात्मा की आवाज अर्थात् वाणी को उनकी आत्माएँ ही पहचानेंगी । अक्षरातीत की इस लीला में ब्रह्मसृष्टियां दुःख के खेल (संसार) में अपने असल स्वरूप व धाम धनी से अपने अखण्ड सम्बन्ध को विस्मृत कर चुकी हैं । श्री राज जी ने इस वाणी में उन्हें प्रबोधित करते हुए परमधाम की सभी बातों का वर्णन किया है । प्राणनाथ जी द्वारा अवतरित इस ज्ञान को पाए बिना आत्मा की जागनी असम्भव है । यह हांसी का खेल आत्माओं के लिए प्रेम की कसौटी है । जो आत्मा इस ज्ञान को गृहण करके इस पर अमल करेगी, वही धन्य-धन्य कहलायेगी ।

अक्षरातीत का यह अलौकिक दिव्य ज्ञान अति दुर्लभ है । उसी प्रकार इसे पाने व हृदय में ग्रहण करने वाले को यह दुर्लभ परमार्थ सिद्धि का लाभ देता है अर्थात् इससे चित्त के सारे अच्छे-बुरे पूर्व संस्कार नष्ट हो जाते हैं, अच्छे-बुरे कर्मों के फल के बन्धन से मुक्ति, हृदय में जागृत बुद्धि के ज्ञान का प्रकाश, परब्रह्म अक्षरातीत का साक्षात्कार, क्षर ब्रह्माण्ड से परे योगमाया में अखण्ड मुक्ति, आदि प्राप्त होता है । श्री मुख वाणी का वास्तविक महत्व समझने वाला मनुष्य इसके लाभ कदापि नहीं गिन सकता क्योंकि वे अनन्त हैं ।

तिन नाबूद की नजर , बीच अखण्ड पहुंचे । अक्षर ठौर सरूप की , इन बानी से देखे ।। (बीतक ७१/१६)

इस ब्रह्मज्ञान (तारतम वाणी) को गृहण करने से इस स्वप्न समान झूठे तन पर बैठे जीव की दृष्टि निराकार के मण्डल को पार करके अखण्ड योगमाया तक पहुँच जाती है । यह तथ्य विचारणीय है कि जिस बेहद धाम (योगमाया) को ढूंढते हुए सबने हार मान ली थी, इस वाणी की कृपा से सभी को उस बेहद से परे अक्षर ब्रह्म और उनसे भी परे अक्षरातीत के निज स्वरूप तथा नूरमयी धाम (परमधाम) का बोध हो सका है ।

इन वाणी के सुनते , खुलत भिस्त के द्वार । आप देखे औरों दिखावहीं , पहुंचे नूर द्वार पार।। (बीतक ७१/२१)

श्री प्राणनाथ जी के श्री मुख से अवतरित इस ज्ञान के सागर को श्रवण करने से सभी जीवों के लिए अखण्ड बहिश्त (मुक्ति स्थान) के द्वार खुल जाते हैं । इसके अतिरिक्त अक्षर ब्रह्म से भी परे परब्रह्म अक्षरातीत के निज स्वरूप, चरित्र, व धाम का भी पता चलता है । यह दिव्य अवसर केवल कानों से सुनने (जानने) तक ही सीमित नहीं है, अपितु उस अलौकिक धाम व साक्षात् परमात्मा के दर्शन का भी सुन्दर लाभ लिया जा सकता है । श्री प्राणनाथ जी की कृपादृष्टि से ही उनके निज स्वरूप के दर्शन करने का सौभाग्य प्राप्त हो सका है ।

ए वानी इन धाम की , ले बैठावत निजधाम । सबको सुख उपजे , होए पूरन मनोरथ काम ।। (बीतक ७१/११)

परमधाम की आत्माओं के लिए यह वाणी अत्यन्त सुखकारी तथा मन के सभी मनोरथ पूर्ण करने वाली है । इस वाणी को सुनते ही ब्रह्मसृष्टियों का मन इसके रस में डूबने लगता है । उन्हें धाम धनी की चर्चा के अतिरिक्त कुछ भी अच्छा नहीं लगता । तत्पश्चात् चितवनि के मार्ग का अनुसरण करके वे इस जड़ सृष्टि में ही अखण्ड व चेतन परमधाम का साक्षात्कार और परमानन्द प्राप्त कर लेती हैं ।

निष्कर्ष यही है कि श्री मुख वाणी के लाभ तो अनन्त हैं, परन्तु यह तो लेने वाली की पात्रता (अंकुर) व क्षमता (निष्ठा) पर निर्भर करता है कि वह इससे कितना लाभ ले पाता है । इसके अतिरिक्त यह भी आवश्यक है कि वाणी को केवल पढ़ा ही न जाये, अपितु उसकी एक-एक चौपाई पर गहन चिन्तन किया जाये, तथा अन्ततः उसे रहनी में लाया जाये । एक बात तो सर्वमान्य है कि परमधाम का ज्ञान देने वाली अक्षरातीत की यह अलौकिक वाणी अति दुर्लभ है तथा जिसे भी इसे सुनने का अवसर प्राप्त हो, वह इस सुअवसर को कदापि न खोये ।

1. रास
2. प्रकास (गुजराती व हिन्दुस्तानी)
3. खटरुती
4. कलस (गुजराती व हिन्दुस्तानी)
5. सनन्ध
6. किरन्तन
7. खुलासा
8. खिलवत
9. परिकरमा
10. सागर
11. सिनगार
12. सिन्धी
13. मारफत सागर
14. कयामतनामा (छोटा व बड़ा)

अक्षरातीत श्री प्राणनाथ जी ने इस २८वें कलयुग में प्रकट होकर परमधाम का अलौकिक ज्ञान प्रस्तुत किया । प्रकृति के नियमानुसार इस लौकिक तन (श्री मिहिरराज) की लीला को विराम देते हुए, श्री प्राणनाथ जी ने श्री कुलजम स्वरूप वाणी को ही अपने स्थान पर पधराकर अपने समान शोभा दी ।

बीतक में लक्ष्मी दास जी का प्रसंग आता है । उसके माध्यम से श्री राज जी ने सभी ब्रह्मसृष्टियों को यह शिक्षा दी है कि तारतम वाणी का कथन सर्वोपरि है । अक्षरातीत के श्री मुख से अवतरित इस वाणी के सिद्धान्तों से बढ़कर कुछ भी मान्य नहीं है ।

अतः यह कहना अनुचित नहीं होगा कि यह वाणी अक्षरातीत श्री प्राणनाथ जी का ही वाङमय (ज्ञानमय) स्वरूप है, अर्थात् श्री प्राणनाथ जी तथा इस ब्रह्मवाणी के स्वरूप में कुछ भी भेद नहीं है । इस वाणी के चौदह अंग श्री जी के चौदह अंगों के समतुल्य हैं । श्री प्रेम सखी (परमहंस महाराज श्री गोपालमणि जी) ने इस एकरूपता को अति सुन्दर ढंग से वर्णित किया है, जिसे सभी सुन्दरसाथ संध्या आरती में गाते हैं-

आरती अंग चतुर्दश केरी । पांच स्वरूप मिल एक भये री ।।१।।

यह आरती श्री प्राणनाथ जी के चौदह अंग युक्त ज्ञानमय स्वरूप की है । उनके स्वरूप में पाँचों शक्तियाँ (अक्षरातीत श्री राज का आवेश, श्री श्यामा जी की आत्मा, श्री अक्षर ब्रह्म की आत्मा, जागृत बुद्धि का फ़रिश्ता इस्राफील, परब्रह्म के जोश का फ़रिश्ता ज़िबरील) विद्यमान हैं । ऐसे सर्वशक्तिमान स्वरूप ने यह दिव्य वाणी अवतरित की है ।

रास चरण प्रकास पिंडुरियां । खटऋतु घूटन कलश जंघन की ।।२।।

श्री रास ग्रन्थ में परम पवित्र प्रेम की झलक प्रस्तुत की गई है । जिस प्रकार चरण पर ही शरीर स्थिर होता है, उसी प्रकार प्रेम ही अक्षरातीत श्री प्राणनाथ जी के स्वरूप का आधार है । इसी लिए रास ग्रन्थ की उपमा श्री जी के चरणों से की गई है । जिस प्रकार चरणों में पिंडली की शोभा होती है, उसी प्रकार श्री महामति जी को इस संसार में सारी शोभा दी गई है । वह श्री प्राणनाथ जी के स्वरूप का ही अंग हैं ।

मानव शरीर में घुटने के बिना चलने की क्रिया नहीं हो सकती । उसी प्रकार विरह की वाणी खटरुती श्री प्राणनाथ जी के स्वरूप में घुटने की शोभा रखती है क्योंकि विरह के बिना प्रेम परिपक्व नहीं हो सकता । श्री कलश ग्रन्थ को जांघों की उपमा दी गई है । जिस प्रकार जांघ में पैरों की शक्ति विद्यमान होती है, वैसे ही कलस की वाणी में श्री प्राणनाथ जी के स्वरूप की पहचान श्री विजयाभिनन्द बुद्ध के रूप में कराई गई है । जांघ पैरों को शरीर से जोड़ते हैं, उसी प्रकार कलस ग्रन्थ में प्रस्तुत सिद्धान्त ही सभी हिन्दू ग्रन्थों का आधार हैं ।

सनंध कमर कर कीरंतन सोहे । नाभि खुलासा उदर खिलवत की ।।३।।

श्री सनंध ग्रन्थ को कमर की उपमा दी गई है । कमर या रीढ़ ही शरीर को दृढ़ता प्रदान करता है । उसी प्रकार सनंध ग्रन्थ में हिन्दू पक्ष की गवाहियों तथा क़ुरआन की आयतों का वास्तविक अर्थ वर्णित करके, उनके प्रमाणों से श्री प्राणनाथ जी के ज्ञान की पुष्टि की गई है । श्री किरन्तन ग्रन्थ को कर (हाथ) की उपमा दी गई है । जिस प्रकार हाथ से सभी कार्य सम्पादित होते हैं, वैसे ही किरंतन ग्रन्थ में सभी विषयों का समावेश होने से सभी पक्षों के ज्ञान में पारंगत हुआ जा सकता है ।

नाभि में मानव तन की सभी नस-नाड़ियों का मिलन होता है । अतः खुलासा ग्रन्थ में सभी धर्मों व पंथों के एकीकरण की बात सिद्ध की गई है । उदर में पचने वाले भोजन से ही मानव तन जीवित रहता है । उसी प्रकार खिलवत ग्रन्थ परमधाम (मारिफत) के ज्ञान की भूमिका है, जिसमें वर्णित इश्क-रब्द (प्रेम प्रसंग) ही इस सम्पूर्ण जागनी लीला का मूल कारण है ।

हृदय तवाफ कण्ठ सागर छबि । मुख सिनगार नासिका सिंधी ।।४।।

अक्षरातीत श्री प्राणनाथ जी के हृदय से ही सम्पूर्ण परमधाम के पच्चीस पक्ष की लीला सम्पादित होती है । परिकरमा ग्रन्थ में परमधाम की शोभा व लीला का विस्तृत वर्णन है, इसलिए उसे हृदय की उपमा दी गई है । कण्ठ से मनुष्य की श्वास (प्राण) क्रिया चलती है तथा कण्ठ दबाने से उसकी मृत्यु हो सकती है । वैसे ही सागर ग्रन्थ में श्री जी के हृदय के आठ सागरों का वर्णन किया गया है, जो प्राणों के समान निकट हैं । अतः सागर को ही कण्ठ कहा गया है। 

मुख मण्डल से ही किसी व्यक्ति की सुन्दरता, तेज, व शोभा का ज्ञान होता है । सिनगार ग्रन्थ में अक्षरातीत श्री राज जी के नूरी स्वरूप का वर्णन किया गया है, जो उनके सौन्दर्य के साथ-साथ उनके हृदय में भरे हुए अनन्त सागरों के आनन्द रस को भी प्रकट करता है । इसलिए सिनगार ग्रन्थ को मुख की उपमा देना उचित ही है । नासिका किसी भी व्यक्ति के आत्मसम्मान का द्योतक होती है । सिंधी ग्रन्थ में प्रेम के विभिन्न रसों (प्रेममयी नोंक-झोंक) का समिश्रण है जो एक समर्पित आत्मा के अधिकारों व महत्व (मूल स्वरूप) का बोध कराता है । अतः सिन्धी ग्रन्थ नाक की उपमा से सुशोभित है ।

श्रवण मारफत नयन सो कयामतनामा । चौदह अंग मिलि एक धनी के ।।५।।

श्रवण (कान) व नयन (नेत्र) से दृश्य (सत्य) को सुना व देखा जाता है । मारफत सागर को श्रवण कहने का अभिप्राय है कि इसमें निहित मारिफत (परम सत्य) ज्ञान को सुनने वाला परम तत्व का जानकार हो जाता है तथा अखण्ड मुक्ति को प्राप्त करता है । उसी प्रकार कयामतनामा को नयन कहा गया है । इस ग्रन्थ में श्री प्राणनाथ जी के स्वरूप को आख़रूल इमाम महंमद महदी का स्वरूप सिद्ध किया गया है । कयामतनामा ग्रन्थ रूपी नेत्रों से देखने पर ही श्री जी के असल स्वरूप की पहचान होती है ।

इस प्रकार यह चौदह अंग मिलकर अक्षरातीत धाम धनी श्री प्राणनाथ जी का वाङमय (ज्ञानमय) स्वरूप बनते हैं ।

श्री सुन्दर श्री इन्द्रावती जीवन । प्रेम सखी बलि बलि चरनन की ।।६।।

श्री सुन्दर बाई (श्री श्यामा जी) व श्री इन्द्रावती सखी का जीवन श्री प्राणनाथ जी की कृपा व प्रेम से पूर्ण रूप से सफल हो गया। ऐसे सुन्दर स्वरूपों के चरण कमलों पर श्री प्रेम सखी अपने को न्यौछावर करती हैं ।

श्री कुल्जम स्वरूप की महिमा

कुलजम सरूप ग्रन्थ में, जो खोजे चित्त लाए। हद बेहद पर धाम लों, आतम दृष्टि लखाए।।

कुलजम सरूप ग्रन्थ को, जो करे नित विचार। आतम जाग्रत होवहीं, खुले धाम के द्वार।।

कुलजम सरूप ग्रन्थ को, नित सेवे जो कोए। पूरण प्रेम जो उपजे, सत्वर दरसन।।

श्री कुल्जम स्वरूप

कुलजम सरूप ग्रन्थ को, पढ़े पढ़ावे कोए। धाम रास बृज जागनी, मिले इंछित सुख सोए।।

कुलजम सरूप ग्रन्थ को, जो करहीं नित पाठ। अहनिस युगल सरूप सों, खेले सातों घाट।।

कुलजम सरूप ग्रन्थ को, सेवे आठों जाम। उन सब सुन्दरसाथ को, करूं दण्डवत प्रणाम।।

रास

रास ग्रन्थ में अक्षरातीत श्री राज जी के द्वारा श्री कृष्ण का तन धारण करके अपनी आत्माओं के साथ की गयी पवित्र प्रेम लीला का वर्णन है । परब्रह्म श्री प्राणनाथ जी की रसमयी ब्रह्मलीला ही रास है । रास ग्रन्थ का अवतरण सम्वत् १७१५ में हब्शा में हुआ था ।

प्रकास गुजराती

प्रकास गुजराती ग्रन्थ का अवतरण श्री प्राणनाथ जी द्वारा सम्वत् १७१५ में हब्शा में हुआ था ।

खटरुती

प्रियतम अक्षरातीत के लिये किये जाने वाले विरह की नींव पर ही अध्यात्म जगत का स्वर्णिम महल खड़ा होता है । विरह से ही हमारा आध्यात्मिक श्रृंगार होता है और इसके द्वारा ही आत्म-जाग्रति का स्वर्णिम पथ भी प्राप्त होता है । बिना विरह के आँसू बहाये यदि कोई प्रियतम के साक्षात्कार का दावा करता है, तो यही समझना चाहिए कि वह सत्य को छिपाना चाहता है ।

श्री इन्द्रावती जी की आत्मा ने अपने जीव को विरह की ज्वालाओं में भस्म कर दिया और अपने प्राणेश्वर को पा लिया । इसकी ही परिणीति यह षट्ऋतु की वाणी है, जो हमें विरह के उसी पुनीत मार्ग पर चलने का आह्वान कर रही है ।

खटरुती ग्रन्थ का अवतरण श्री प्राणनाथ जी द्वारा सम्वत् १७१५ में हब्शा में हुआ था । एक वर्ष में ६ ऋतुएँ होती हैं- ग्रीष्म, वर्षा, शरद, हेमन्त, शिशिर और वसन्त। प्रत्येक ऋतु में आत्मा अपने प्रियतम अक्षरातीत से मिलने के लिए विरह में किस प्रकार तड़पती है, उसका प्रत्यक्ष वर्णन इस ग्रन्थ में किया गया है ।

कलस गुजराती

यद्यपि कलश गुजराती की दो चौपाइयाँ हब्शा के अन्दर सम्वत् १७१५ में ही उतर गयी थीं, किन्तु इसका पूर्ण अवतरण सम्वत् १७२९ में सूरत में हुआ ।

प्रकास हिन्दुस्तानी

प्रकाश हिन्दुस्तानी ग्रन्थ का अवतरण श्री प्राणनाथ जी द्वारा सम्वत् १७३६ में अनूपशहर में हुआ था ।

प्रकास ग्रन्थ में ८४ लाख योनियों में जन्म लेने के बाद मानव तन का महत्व बताते हुए माया-ब्रह्म के अन्तर का वर्णन है । इसके अतिरिक्त बेहदवाणी, प्रकटवाणी, भागवत सार, १०८ पक्षों का वर्णन, सदगुरु स्वरूप धाम धनी के विरह में तड़पने वाली आत्मा की मनोदशा का यथार्थ वर्णन है, जिसे पढ़कर हृदय के पट खुल जाते हैं । इस ग्रन्थ के माध्यम से यह बात स्पष्ट की गई है कि श्री महामति जी को ही इस संसार में सारी शोभा है ।

कतेब पक्ष की दृष्टि में इसे "जंबूर" भी कहते हैं । जंबूर उस यन्त्र को कहते हैं जो धँसी हुई कील निकालता है अर्थात् अध्यात्म के उलझे हुए रहस्यों को स्पष्ट व प्रकाशित करना । दाऊद के जंबूर ग्रन्थ के रहस्यों का स्पष्टीकरण इसी ग्रन्थ में है ।



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कलस हिन्दुस्तानी

कलस ग्रन्थ में अखण्ड ब्रज, अखण्ड रास (योगमाया) व बुद्ध अवतार का वर्णन है जिससे श्री प्राणनाथ जी के स्वरूप की पहचान होती है । इसमें प्रेम, विरह, परब्रह्म अक्षरातीत की कृपा, परमधाम की आत्माओं के लक्षण तथा उनकी जागनी का अति सुन्दर वर्णन है । इसके अतिरिक्त संसार के ज्ञानीजनों के भटकाव का सुन्दर चित्रण करते हुए हिन्दू धर्म के अनेक रहस्यों का स्पष्टीकरण किया गया है । जिस प्रकार मंदिर की गुमटी पर कलश शोभायमान होता है, उसी प्रकार यह ग्रन्थ सभी हिन्दू ग्रन्थों पर कलश के समान सुशोभित है ।

कलस हिन्दुस्तानी का अवतरण सम्वत् १७३६ में अनूपशहर में हुआ । कतेब पक्ष की दृष्टि में इसे "तौरेत" भी कहे जाता है । तौरेत ग्रन्थ के रहस्यों का स्पष्टीकरण इसी ग्रन्थ में है ।

सनन्ध

सनंध का अर्थ होता है- प्रमाण या सनद (मुहर) । इस ग्रन्थ में कलस ग्रन्थ के कुछ प्रकरणों का पुनः उल्लेख तथा क़ुरआन के तीस पारों का वास्तविक अभिप्राय वर्णित करते हुए दोनों पक्षों द्वारा श्री प्राणनाथ जी के ज्ञान की प्रमाणिकता सिद्ध की गयी है । महंमद साहेब के असली स्वरूप की भी पहचान कराई गई है ।

इस ग्रन्थ का अवतरण सम्वत् १७३६ में अनूपशहर में हुआ है । इसमें अधिकांश चौपाइयाँ हिन्दुस्तानी भाषा में तथा शेष अरबी व सिंधी भाषा में हैं जिनमें अरब व सिंध के मुसलमानों को प्रबोधित किया गया है ।

इस ग्रन्थ में संसार के विभिन्न मत-मतांतरों का उल्लेख करते हुए मोमिनों (ब्रह्मसृष्टियों) के लक्षण बताये गए हैं तथा नबी (मुहम्मद साहेब) व आदि नारायण की आध्यात्मिक पहुँच का भी सुन्दर ढंग से वर्णन किया गया है । मुहम्मद साहेब की तीन सूरत (बसरी, मलकी और हकी) की पहचान, आखिरत का न्याय, आखरूल जमां इमाम मेंहदी का प्रताप, पांचों फरिश्तों, व अक्षरातीत की पहचान भी कराई गई है ।

इसमें क़ुरआन के वास्तविक अर्थों के अनुसार सच्चे मुसलमान का हिंसा रहित, पवित्र, व आदर्श आचरण सविस्तार व्यक्त किया गया है । शरीयत से आगे निकलते हुए तरीकत व हकीकत का मार्ग प्रस्तुत किया गया है । सच्चे मुसलमानों के लिए रोजा, हज, नमाज, तथा जकात का यथार्थ रूप बताया गया है ।

इसके अतिरिक्त इस ग्रन्थ में हिन्दू और मुसलमान दोनों के आडम्बरों का स्पष्ट एवं निष्पक्ष चित्रण है । आध्यात्म की राह पर चलने वालों को यह शिक्षा भी दी गई है कि वह भाषा व वेशभूषा (धर्म) के विवाद से दूर रहकर उस परम सत्य को पाने की ओर केन्द्रित रहें ।

किरन्तन

किरंतन का तात्पर्य "कीर्तन" से है । इस ग्रन्थ में श्री कुलजम स्वरूप के सभी तत्वों व विषयों का समावेश है, जिस कारण यह उसका एक लघु रूप है ।

यह ग्रन्थ हिन्दुस्तानी, गुजराती, एवं सिन्धी भाषा में है । किरन्तन ग्रन्थ का अवतरण काल सम्वत् १७१२ से १७५१ है । यद्यपि १७४८ में मारफत सागर ग्रन्थ के अवतरण के पश्चात् वाणी का अवतरण लगभग पूर्ण हो गया, परन्तु उसके बाद भी किरन्तन ग्रन्थ के कुछेक प्रकरण उतरते रहे जो धाम चलने (चितवनि) से सम्बन्धित हैं ।

श्री प्राणनाथ जी जागनी कार्य हेतु जहाँ-जहाँ गये, वहाँ के विद्वानों, सन्यासियों, तथा जिज्ञासुओं से जो वार्ता, शास्त्रार्थ, सत्संग आदि हुआ, उस स्थिति के अनुसार ही परब्रह्म के आवेश से किरन्तनों का अवतरण हुआ । अतः इन किरन्तनों में विषयानुसार अध्यात्म के सभी पक्षों का वर्णन है ।

किरन्तन ग्रन्थ में श्री प्राणनाथ जी को ही श्री विजयाभिनन्द बुद्ध निष्कलंक स्वरूप उद्घोषित किया गया है ।

इसमें वेद, दर्शन शास्त्र, व वेदान्त के उन गूढ़ रहस्यों का स्पष्टीकरण हुआ है, जिसे सृष्टि के प्रारम्भ से लेकर आज तक कोई नहीं बता सका था । यह ग्रन्थ ज्ञानीजनों व योगियों के मन के सभी संशयों को मिटाकर उन्हें माया-ब्रह्म की स्पष्ट पहचान कराता है । निष्पक्ष हृदय तथा ब्रह्मज्ञान की लालसा से युक्त कोई भी सच्चा जिज्ञासु इस ज्ञान को पाकर धन्य हो जायेगा ।

खुलासा

खुलासा का अर्थ होता है प्रकट या स्पष्ट करना । इस ग्रन्थ में क़ुरआन के छिपे हुए भेदों को खोला गया है तथा वेद, गीता, भागवत, क़ुरआन, पुराण व हदीसों के आधार पर धर्म का परिचय व एकीकरण दर्शाया गया है ।

इस ग्रन्थ का अवतरण पन्ना में हुआ । इसमें मुहम्मद साहेब द्वारा परब्रह्म के दीदार एवं उनकी सूरत को बयान किया गया है । अक्षर व अक्षरातीत की पहचान का विस्तार से वर्णन है । क़ियामत के सात निशानों तथा योगमाया में कज़ा (न्याय) की लीला के पश्चात् होने वाली उन आठ बहिश्तों (मुक्ति स्थान) का भी विशेष वर्णन है, जिसमें इस ब्रह्माण्ड के सभी प्राणी अखण्ड होंगे ।

इसके अतिरिक्त परमधाम (लाहूत) में होने वाली लीला की हक़ीकत (वास्तविकता) पर भी इस ग्रन्थ में अच्छी तरह प्रकाश डाला गया है ।

खिलवत

"खिल्वत" का शाब्दिक अर्थ होता है अन्तःपुर । यह अरबी भाषा का "खल्वत" शब्द है, जिसका तात्पर्य है एकान्त स्थान । यह वह स्थान है जहाँ आशिक और माशूक (प्रेमी और प्रेमास्पद) अपनी प्रेम लीला को क्रियान्वित करते हैं । बाह्य रूप में खिल्वत किसी स्थान विशेष को मान सकते हैं, किन्तु आन्तरिक रूप में आशिक और माशूक का दिल (हृदय) ही वास्तविक खिल्वत की संज्ञा प्राप्त करता है ।

इस ग्रन्थ का अवतरण पन्ना जी में हुआ । प्रारम्भ के पाँच प्रकरणों में "मै खुदी" (अहं) को त्यागने का विशेष वर्णन है । तत्पश्चात् स्वलीला अद्वैत परब्रह्म का अपनी आत्माओं तथा आनन्द के स्वरूप श्री श्यामा जी से होने वाले अलौकिक इश्क-रब्द (प्रेम-प्रसंग) का सविस्तार वर्णन किया गया है । इसमें स्पष्ट किया गया है कि परमधाम के जर्रे-जर्रे में अक्षरातीत का इश्क, आनन्द, और वाहेदत (एकदिली) समाया हुआ है ।

संसार के प्रपञ्चों से हटाकर आत्मा को परमधाम की ओर ले जाना ही इस ग्रन्थ का मुख्य आशय है ।

परिकरमा

अक्षर ब्रह्म व अक्षरातीत परब्रह्म के मूल स्वरूप जिस दिव्य धाम में विराजमान हैं, उसका स्पष्ट वर्णन आज तक इस ब्रह्माण्ड में नहीं हो सका था । सभी उसे शब्दातीत व अगम कहकर मौन हो गए क्योंकि स्वप्न की बुद्धि वहाँ तक नहीं पहुँच सकती । पुराण संहिता और माहेश्वर तन्त्र में शिव जी ने जिस धाम को अक्षरातीत का परमधाम मानकर वर्णन किया है, वह केवल ब्रह्म (योगमाया) का ही वर्णन है, परमधाम का नहीं । वेद और क़ुरआन में सांकेतिक रूप में परमधाम का वर्णन अवश्य है । वेदों में उसे "दिव्य ब्रह्मपुर" तथा क़ुरआन में उसे "अर्शे अज़ीम" व "लाहूत" कहकर पुकारा गया है, किन्तु उनके संकेतों को तारतम ज्ञान के बिना कोई समझ नहीं सकता ।

परिकरमा ग्रन्थ का अवतरण पन्ना जी में हुआ । इसमें उस अलौकिक परमधाम का वर्णन है जो सत्य, चेतन, तेजमयी, अनन्त प्रेम और आनन्द से युक्त, अनन्त परिधि वाला, तथा स्वलीला अद्वैत है ।

उस अगम परमधाम का विस्तृत व स्पष्ट वर्णन तो स्वयं पूर्णब्रह्म अक्षरातीत श्री प्राणनाथ जी ने ही इस ग्रन्थ में किया है । अक्षरातीत के अनादि परमधाम में सात परिक्रमायें वर्णित हैं- १. रंगमहल २. हौजकौसर, पुखराज, फूलबाग, नूरबाग, बट-पीपल की चौकी ३. माणिक पहाड़ ४. जवेरों की नहरें ५. वन की नहरें ६. छोटी रांग- चार हार हवेली ७. आठ सागर- आठ जिमीं । इन्हीं सात परिक्रमाओं का सविस्तार वर्णन करने हेतु प्रकटे इस ग्रन्थ को परिकरमा कहा गया है ।

इस ग्रन्थ में शब्दातीत परमधाम के अनन्त विस्तार एवं शोभा को अति सीमित करके शब्दों में लाने का प्रयास किया गया है, ताकि वह इस स्वप्न की बुद्धि में समा सके । इसमें उस अलौकिक धाम का ऐसा सजीव वर्णन है कि पढ़ने मात्र से ऐसा प्रतीत होता है कि वहाँ का दृश्य आँखों के समक्ष उपस्थित हो गया है । परमधाम में होने वाली अष्ट प्रहर की लीला का भी अति मनमोहक वर्णन है ।



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सागर

सागर ग्रन्थ का अवतरण सम्वत् १७४४ में पन्ना जी में हुआ । यह ग्रन्थ अक्षरातीत के हृदय एवं स्वरूप के आठों सागरों पर विशेष रूप से प्रकाश डालता है ।

अक्षरातीत का हृदय दिव्यताओं का सागर है । श्री राज जी के हृदय में प्रेम, सौन्दर्य, ज्ञान, तेज, एकत्व, कृपा आदि के अनन्त सागर लहरा रहे हैं, जिनका प्रकट रूप परमधाम के पच्चीस पक्ष, आनन्द अंग श्री श्यामा जी, सखियाँ (आतमाएँ), अक्षर ब्रह्म, आदि हैं । निम्नलिखित आठ सागरों का इस ग्रन्थ में विस्तृत वर्णन किया गया है-

1. अक्षरातीत के नूर (तेज) का सागर
2. सखियों की अलौकिक शोभा का सागर
3. सखियों की वाहेदत (एकदिली) का सागर
4. युगल स्वरूप श्री राजश्यामा जी की शोभा-श्रृंगार का सागर
5. इश्क (प्रेम) का सागर
6. अनन्त ज्ञान का सागर
7. मूल निसबत (सम्बन्ध) का सागर
8. मेहर (कृपा) का सागर

परमधाम की आत्माओं का इस नश्वर जगत में पदार्पण होने पर अक्षरातीत ने उनके लिए यह अलौकिक दिव्य ज्ञान अवतरित किया, जिससे आत्माओं ने उन गोपनीय गुह्य भेदों को जान लिया जिन्हें वे परमधाम में भी नहीं जानती थीं । जिस प्रकार नमक का ढेला सागर की गहराई नहीं नाप सकता, उसी प्रकार अक्षरातीत के प्रेम की स्वरूप उनकी आत्माएँ युगल स्वरूप के आठों सागर में इस प्रकार खो जाती हैं कि उन्हें अपनी जरा भी सुध नहीं रहती ।

सिनगार

सिनगार ग्रन्थ का अवतरण सम्वत् १७४७ में पन्ना जी में हुआ । यह ग्रन्थ अक्षरातीत श्री राज जी के श्रृंगार पर बृहत् रूप से प्रकाश डालने वाला है ।

संसार के सभी ऋषि-मुनि तथा देवी-देवता जिस परब्रह्म को खोजते-खोजते हार गए और न मिलने पर शब्दातीत कहकर चुप हो गए, उन्हीं अक्षरातीत के स्वरूप की शोभा व श्रृंगार का इस ग्रन्थ में कई बार वर्णन किया गया है । तेज व प्रेम से सुशोभित पूर्ण ब्रह्म का नख से लेकर शिख तक विस्तृत वर्णन है, जिसे पढ़ने वाला धन्य-धन्य हो जाता है । अध्यात्म का यह सर्वेच्च ज्ञान अक्षर ब्रह्म की जागृत बुद्धि से भी परे है, तो संसार के ऋषि-मुनियों तथा त्रिदेव की तो कल्पना भी इस तक नहीं पहुँच सकती ।

सिनगार ग्रन्थ की वाणी ब्रह्मसृष्टियों (आत्माओँ) के लिए मारिफत (परम सत्य) का द्वार खोलती है । इसके बिना धाम धनी अक्षरातीत के दिल में बैठकर उनके सागरों के गुह्य रहस्यों को नहीं जाना जा सकता । श्री राज जी के हृदय के जिन भेदों को परमधाम से लेकर आज तक जाना नहीं जा सका था, वह सब इस ग्रन्थ में निहित हैं ।

सिन्धी

सिन्धी ग्रन्थ का अवतरण श्री पन्ना धाम में हुआ । यह ग्रन्थ सिन्धी भाषा में है, अतः इसका नाम "सिन्धी" रखा गया है । इसमें आत्मा का अपने प्रियतम अक्षरातीत के प्रति प्रेम दर्शाया गया है ।

इस ग्रन्थ में परमात्मा से आत्मा (श्री इन्द्रावती) की प्रेममयी नोंक-झोंक (वार्ता) का अति सुन्दर वर्णन है, जिससे उनकी निसबत (सम्बन्ध) का ज्ञान होता है । इस संसार के ज्ञानीजन परमात्मा को ठीक से जाने बिना नवधा भक्ति व कर्मकाण्ड में व्यस्त रहते हैं, जबकि परमधाम की आत्मा परमात्मा की साक्षात् तन हैं । इस ग्रन्थ में वर्णित वार्ता उनके प्रेममयी अखण्ड सम्बन्ध का ही परिचायक है ।

सिन्धी वाणी प्रेम के रस से सराबोर है । इसे पढ़कर यह ज्ञात होता है कि किस प्रकार आत्मा अपने प्रियतम सच्चिदानन्द से अधिकारपूर्वक प्रेम व आनंद की मांग करती है । यह अधिकार पूर्ण समर्पण से प्राप्त होता है । इसके अवलोकन से यह भी पता चलता है कि परमधाम में आत्मा व धाम धनी श्री राज जी का स्वरूप व शोभा समान है । उनके बीच चलने वाली प्रेममयी लीला की गहराई का भी आभास होता है ।

मारफत सागर

मारफत सागर ग्रन्थ का अवतरण सम्वत् १७४८ में पन्ना जी में हुआ । इस ग्रन्थ में मारिफ़त ज्ञान (परम सत्य, विज्ञान) का वर्णन है, इसी आधार पर इसका नाम मारफत सागर रखा गया । इसमें आध्यात्मिक जगत के गुह्य रहस्यों तथा क़ुरआन के अब तक छुपे रहस्यों का स्पष्टीकरण है ।

अल्लाह तआला (अक्षरातीत श्री प्राणनाथ जी) ने मेअराज (साक्षात्कार) के समय अर्श-ए-अज़ीम (परमधाम) में मुहम्मद साहेब (अक्षर ब्रह्म की आत्मा) से वादा किया था कि वह स्वयं पृथ्वी पर आकर मारिफत ज्ञान प्रकट करेंगे । मुहम्मद साहेब को क़ुरआन के रूप में शरीअत (कर्मकाण्ड) व तरीक़त (उपासना) का ज्ञान प्रकट करने की छूट थी, परन्तु हक़ीकत व मारिफ़त ज्ञान वर्णन करने की शोभा स्वयं परब्रह्म अक्षरातीत की है । यह मारिफ़त का ज्ञान क़ुरआन के ताले (रहस्यों) की कुंजी है ।

इस ग्रन्थ में अर्श (परमधाम) में अल्लाह (श्री प्राणनाथ जी) व उनकी रूहों (आत्माओं) में होने वाले इश्क-रब्द के प्रसंग का वर्णन है । लैल-तुल-कद्र की रात्रि की व्याख्या है । इसमें क़ियामत के सातों निशानों- सूरज का मगरब (पश्चिम) में उगना, दाभ-तुल-अरज़ (सबसे बड़े जानवर) का पैदा होना, याजूज-माजूज का जाहिर होना, काने दज्ज़ाल का प्रकट होना, इस्राफील का सूर फूँकना, रूह अल्लाह और इमाम महदी के प्रकट होने के प्रसंगों का वास्तविक आशय स्पष्ट किया गया है । इसके अतिरिक्त छह दिन की पैदाइश और अज़ाजील, ज़िबरील, व इस्राफील फरिश्तों की वास्तविकता का भी वर्णन किया गया है ।

यह "मारफत सागर" ज्ञान का ऐसा सूर्य है, जिसके प्रकट होने के बाद अन्य ग्रन्थों की आवश्यकता नहीं रहती ।

कयामतनामा

यह ग्रन्थ दो भागों में प्रस्तुत किया गया है- छोटा कयामतनामा और बड़ा कयामतनामा । ये दोनों ही ग्रन्थ सम्वत् १७४७ में चित्रकूट में अवतरित हुए । यद्यपि ये ग्रन्थ श्री प्राणनाथ जी की आवेश शक्ति से ही प्रकट हुए, परन्तु इनमें महाराजा छत्रसाल जी की छाप है, अर्थात् श्री जी द्वारा यह शोभा उन्हे दी गई है ।

क़ुरआन के अनुसार ग्यारहवीं सदी (हिजरी) में आख़रूल इमाम महंमद महदी साहिब़ुज्ज़मां (श्री प्राणनाथ जी) प्रकट होंगे । इन ग्रन्थों में उन्हीं की पहचान विशेष रूप से बतायी गई है । इसके अतिरिक्त परमधाम की आत्माओं तथा संसार के जीवों के आचरण का भेद प्रस्तुत किया गया है ।

इन ग्रन्थों में महंमद साहेब को अक्षरातीत का मेअराज (साक्षात्कार) होने का वर्णन है । इसके अतिरिक्त महंमद साहेब की तीन सूरतों- बसरी, मलकी, और हकी की हकीकत स्पष्ट की गई है।

इसमें क़ुरआन के विभिन्न किस्सों का बातिनी अर्थ किया गया है । दस प्रकार की दोज़ख, इमाम महदी के प्रकटन के साथ ही क़ियामत के ज़ाहिर होने, आदि का वर्णन है । संक्षाप में, यह ग्रन्थ आखिरत की सारी बातें स्पष्ट करते हैं ।



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